प्रश्न -कबीरदास के साधु के संबंध में क्या विचार है ?
उत्तर - संत कबीरदास जी ने इसे बहुत दोहों के माध्यम से बताया है।
संत कबीरदास कहते हैं कि हमें ऐसे साधु की संगति करनी चाहिए, जो सूप के समान हो। जैसे सूप काम की चीज़ को अपने पास रखता है और बेकार चीज़ को उड़ा देता है, वैसे ही सच्चे साधु को सार्थक और उपयोगी बातों को अपनाना चाहिए और व्यर्थ की बातों को त्याग देना चाहिए।
कबीरदासजी हिंदुओं में फैले जातिवाद पर कटाक्ष करते हुए कहते थे कि किसी व्यक्ति से उसकी जाति नहीं पूछनी चाहिए बल्कि ज्ञान की बात करना चाहिए। क्योंकि असली कीमत तो तलवार का होता है, तलवार रखने वाली म्यान का नहीं।
एक अन्य साखी में कबीरदास ने हा है सच्चा साधु वही होता है जो भाव (सच्ची श्रद्धा और प्रेम) का भूखा होता है, न कि धन का। जो व्यक्ति धन के लिए इधर-उधर भटकता है और उसे पाने की लालसा करता है, वह साधु नहीं हो सकता।
संत कबीरदास ने साधु का महत्व स्पष्ट करते हुए कहा है कि साधु अर्थात सज्जन व्यक्ति का साथ हमेशा रखना चाहिए क्योंकि वे दूसरों की पीड़ा को दूर करते हैं। इसके विपरीत असाधु अर्थात दुष्ट व्यक्ति के साथ रहने से व्यक्ति को हमेशा परेशानी झेलनी पड़ती है। इसलिए हमेशा सभी व्यक्तियों को हमेशा साधु अर्थात सज्जन व्यक्ति की ही संगत करना चाहिए।
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