पाठ - पर्यावरण संरक्षण: हमारा नैतिक दायित्व
प्रश्न - संक्षेप में जीवधारियों के नाश के कारण बतलाइए।
अथवा
स्पष्ट कीजिए कि कौन सी परिस्थितियाँ प्रदूषणजन्य हैं?
उत्तर- वास्तव में यदि एक और कल-कारखाने और उद्योग बढ़ते जा रहे हैं तो दूसरी ओर उसी अनुपात में मोटरगाड़ियां भी बढ़ती जा रही है और अति आवागमन तथा शोर-शराबे के बीच
मानव प्राणी की सुनने की शक्ति कमजोर होती जा रही है। अतएव आश्चर्य नहीं कि आगामी बीस-तीस वर्षों के बाद बच्चे में सुनने की योग्यता कम हो या बच्चे नही पैदा हों। मिलों और कारखानों के कर्मचारी ढलती उम्र में इसका स्पष्ट अनुभव करते हैं। साथ ही उद्योगों ने हवा, पानी और हमारे रोज के जीवन में जहर घोल दिया है तथा यह कहना कठिन है कि हम इस अभिशाप से छुटकारा पा सकेगे। यदि प्रदूषणरहित टेक्नालाजी का विकास संभव हुआ, तो आशा की जाती है कि जनजीवन के स्वास्थ्य की रक्षा हो सकेगा। विचारपूर्वक देखा जाय तो बिगड़े हुए पर्यावरण से मानव प्राणी ही नहीं, सहनशक्ति कम होने के कारण अन्य जीवधारी भी आतंकित हैं और इसका अनुभव हमें किसी जीव को विलुप्ति से होता है। स्वीडन के एक प्राणिविज्ञानी के अनुसार 'इस धरती की ३०० मे अधिक जातियाँ (Species) तथा उपजातियों (Sub-Specics) लुप्त हो चुकी हैं।' यह भी अनुमान किया जाता है कि वर्तमान शताब्दी में भू-मंडल पर कहीं-न-कहीं हर साल एक जाति का लोप हो रहा है तथा जीवधारियों के विलुप्तीकरण का सीधा संबंध हमारे पर्यावरण से है, जो उनके प्रतिकूल बनता जा रहा है। लेखक के अनुसार प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण जीवधारियों का अस्तित्व खतरे में है और ये सारी परिस्थितियाँ प्रदूषणजन्य हैं।
प्रश्न - 'मौसम भी बदले' उपशीर्षक के अंतर्गत व्यक्त लेखक के विचार संक्षेप में लिखिए।
अथवा
संक्षेप में बतलाइए कि प्रदूषण से मौसम किस प्रकार प्रभावित हो सकता है।
उत्तर - लेखक ने 'पर्यावरण संरक्षण: हमारा नैतिक दायित्व' शीर्षक निबंध में 'मौसम भी बदले' उपशीर्षक के अंतर्गत हमारा ध्यान इस ओर आकृष्ट किया है कि वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा बढ़ रही है और सामान्य स्थितियों में पौधे इसे खींचकर प्राणवायु अर्थात आक्सीजन को मुक्त करते हैं, किंतु वन-विनाश तथा शहरीकरण की प्रवृत्ति से दिनों-दिन इस प्राकृतिक व्यवस्था में रुकावट आ रही है। अतएव कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा वायुमंडल में पर्याप्त मात्रा में व्याप्त रहती है तथा वह धूप को गुजरने तो देती है किंतु पृथ्वी के वायुमंडल से ताप को पुनः विकरित नहीं होने देती और इस तरह वायुमंडल का ताप धीरे-धीरे बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा इसी तरह बढ़ती रही तो अगले ३०-४० वर्षों में धरती के ताप में ३० से ५० तक की अनावश्यक वृद्धि हो जाएगी। इसके फलस्वरूप शीतोष्ण क्षेत्र मरुस्थल हो सकते हैं तथा ध्रुवों की बर्फ पिघलने के कारण जलप्रलय की संभावना भी हो सकती है।
वस्तुतः हमारे वातावरण में कुछ ऊँचाई पर ओजोन (०) की एक परत है, जो सूर्य की पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है क्योंकि ये घातक किरणें उस परत में अवशोषित हो जाने से हमें दोषमुक्त धूप मिलती है। सत्य तो यह है कि यदि यह सुरक्षा-आवरण न होता तो तमाम प्राणी धूप-ताम्रता (Sun-boun) और त्वचा-कैसंर में पीड़ित हो जाते किंतु हाल ही में ज्ञात हुआ है कि कई उद्योगो मे पुनः होनेवाला रसायन खासकर ओजोन पट्टी में पहुंचकर रासायनिक प्रक्रिया में उसका नाश करने है। इस प्रकार इसके प्रभाव से वायुमंडल में परिवर्तन हो सकता है और मौसम भी प्रभावित हो सकता है।
प्रश्न - स्पष्ट कीजिए कि "पर्यावरण सुरक्षा के लिए विश्व नीति जरूरी है।"
अथवा
पर्यावरण संरक्षण के लिए विश्व में जो कदम उठाए गए, उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर - वस्तुतः लेखक ने 'पर्यावरण संरक्षण' की आवश्यकता पर विचार करते हुए यह भी संकेत किया है कि 'पर्यावरण सुरक्षा' के लिए विश्व नीति जरूरी है क्योंकि विभिन्न देश अलग-अलग कदम उठाकर संपूर्ण पृथ्वी के लिए विनाशकारी स्थिति पैदा कर सकते है। अतएव हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हम भले ही अलग-अलग देश और जाति के हों किंतु पृथ्वी एक है और प्रकृति सार्वभौम है। इस प्रकार हमें केवल अपने लिए नहीं, संपूर्ण पृथ्वी के लिए उसको इकाई मानकर कुछ-न-कुछ कदम उठाना पड़ेगा।
यद्यपि १९४८ में फ्रांस के फोतेनव्ता में संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता से प्रकृति के - संरक्षण का अंतर्राष्ट्रीय संघ (ICON) स्थापित हुआ था, जो अब विश्व-संरक्षण का संगठन बन चुका है लेकिन वास्तविक कार्य प्रारंभ हुआ संयुक्त राष्ट्रसंघ और विश्व स्वास्थ्य संघठन आदि के सहयोग से १९६८ में पेरिस में आयोजित 'जीवमंडल कांफ्रेस' से। इस कांफ्रेस के पश्चात विश्व-पर्यावरण के संबंध में जो चेतना मुखर हुई थी, उसे १९७२ में स्टाकहोम में आयोजित संयुक्त राष्ट्रसंघ की 'मानव पर्यावरण कांफ्रेस' से अधिक बल प्राप्त हुआ।
वस्तुतः उक्त कांफ्रेस में राजनीतिज्ञों की अधिकता होने के कारण, पर्यावरण को विश्व स्तर पर राजनीतिक सहारा प्राप्त हुआ और यह महसूस किया गया कि पर्यावरण संरक्षण हेतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयत्न करने चाहिए। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि स्टाकहोम में ११० से अधिक राष्ट्रों के प्रतिनिधि उपस्थित थे और उक्त अवसर पर राष्ट्रीय सरकारों तथा अंतर्राष्ट्रीय संगठन के लिए १०९ सूत्री सिफारिशें स्वीकार की गई। इस प्रकार उक्त सम्मेलन के निष्कर्षों को वैज्ञानिक और राजनीतिक दोनों रूपों में स्वीकृति प्राप्त हुई है।
प्रश्न - लेखक ने प्रदूषण से बचाव के लिए क्या उपाय बताया है?
उत्तर - लेखक ने प्रदूषण से बचान का उपाय बतलाते हुए कहा है कि आवश्यकता है प्रदूषण-रहित टेक्नालाजी की। यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि विज्ञान और टेक्नालाजी तो आज के युग के अभित्र अंग है, जिनसे अलग हो पाना कोरी कल्पना की बात है किंतु उद्योगों का विकल्प भला क्या होगा? इतना अवश्य है कि हम उद्योगों में ऐसी टेक्नालाजी विकसित करें जो प्रदूषण-रहित हो अर्थात औद्योगिक कचरे का विनाश इस तरह किया जाय कि वह वायु अथवा जल को प्रदूषित न कर सके।
प्रश्न - लेखक ने वन-रोपण के संबंध में क्या मत व्यक्त किया है?
उत्तर - लेखक का कहना है कि वन न केवल हमारी संस्कृतियों के हमेशा पोषक रहे हैं बल्कि हमारे रक्षक भी हैं। यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि वन से भू-क्षरण और भू-स्खलन तथा बाढ़ें रुक सकती हैं। साथ ही वन. शोर-प्रदूषण भी कम करते हैं। अतएव फैक्टरियों और प्रयोगशालाओं के आस-पास वृक्ष लगाने चाहिए, जिससे कि शोर की मात्रा कुछ तो कम हो। इस प्रकार वन-रोपण को सामाजिक यांत्रिकी का महत्त्वपूर्ण अंग मानना चाहिए और उसे राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
प्रश्न - संक्षेप में श्री सुंदरलाल बहुगुणा के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
'चिपको आंदोलन' किसने प्रारंभ किया था और उन्हें किस प्रकार प्रशंसा प्राप्त हुई थी?
उत्तर - लेखक ने 'वनसंरक्षण: एक आंदोलन' का परिचय देते हुए कहा है कि श्री सुंदरलाल बहुगुणा ने 'वन-संरक्षण' के लिए 'चिपको आंदोलन' प्रारंभ किया और उनकी प्रेरणा से उत्तर भारत में हिमालय के दुःखद वन-विनाश के विरुद्ध पहाड़ की महिलाओं ने भी तीव्र आंदोलन किया। लेखक के अनुसार श्री सुंदरलाल बहुगुणा ने अपना जीवन वन-संरक्षण हेतु समर्पित कर दिया और उनकी महत्त्वपूर्ण सेवाओं को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने उन्हें । 'पद्मश्री' की उपाधि से विभूषित किया। वास्तव में यह 'चिपको आंदोलन' में लगे लाख-लाख वन प्रेमियो का अभिनंदन है और उनके आंदोलन की तथा उनकी माँग की स्वीकारोक्ति है। यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि न्यूजीलैंड के ९१ वर्षीय डा. रिचर्ट वेकर (जिन्हें प्रायः वृक्ष मानव - 'मैन ऑफ दि ट्रीज' नाम से जाना जाता है) चिपको आंदोलनकारियों को बधाई देने भारत आए थे।
प्रश्न - लेखक श्री शुकदेव प्रसाद ने इतिहास का उदाहरण देकर क्या स्पष्ट किया है?
उत्तर - लेखक श्री शुकदेव प्रसाद का कहना है कि किसी ने इतिहास की यह रूपरेखा बताई है कि 'सभ्य मानव पृथ्वी के एक छोर से चलकर दूसरी छोर पर पहुँच गया है और वह जहाँ से भी गुजरा है, वहाँ भूमि मरुस्थल हो गई है।' यद्यपि इस कथन में कुछ अतिशयोक्ति हो सकती है परंतु यह बेबुनियाद नहीं है। वास्तव में सभ्य मानव जहाँ भी अधिक समय तक रहा है, उसने वहाँ की भूमि को बर्बाद कर दिया है। यही कारण है कि प्रगामी सभ्यताएँ स्थान-परिवर्तन करती रही हैं और न केवल प्राचीन वैसे सभ्यताओं के पतन का भी मुख्य कारण यही रहा है बल्कि इतिहास की सभी प्रवृत्तियों का कारण भी यही रहा है।
प्रश्न - बढ़ती हुई आबादी के संबंध में लेखक के विचार संक्षेप में लिखिए ?
उत्तर - लेखक के अनुसार विद्वानों का अनुमान है कि जब आज से २०-३० लाख वर्ष पूर्व, इस धरती पर मानव का आगमन हुआ था तब सन १८३० तक संसार की कुल आबादी केवल एक अरब थी किंतु अगले सौ वर्षों में ही अर्थात सन १९३० तक आबादी दुगुनी हो गई। कहने का अभिप्राय यह है कि जितनी जनसंख्या लाखों सालों में उत्पन्न हुई, उतनी केवल इधर के १०० वर्षों में ही पैदा हो गई। आबादी की इस बढ़ती रफ्तार ने और गति पकड़ी तथा अगली एक अरब की वृद्धि केवल ३० वर्ष में ही हो गई। इस प्रकार १९६० तक धरती पर ३ अरब स्त्री-पुरुष हो गए और फिर अगले १५ वर्षों में ही अर्थात १९७५ तक आबादी बढ़कर ४ अरब हो गई। अव अनुमान है कि सन २००० तक जनसंख्या लगभग ७ अरव हो जाएगी। आबादी की इस बेतहाशा वृद्धि का प्रभाव हमारे सामाजिक मूल्यों पर पड़े बिना नहीं रहेगा।
प्रश्न - संक्षेप में बतलाइए कि पर्यावरण से अन्य जीवधारी किस प्रकार आतंकित हैं?
उत्तर - वस्तुतः पर्यावरण से मानव ही नहीं अन्य जीवधारी भी निम्नानुसार आतंकित हैं क्योंकि उनकी सहनशक्ति मनुष्य से कम होती है। इसका अनुभव हमें किसी जीव की विलुप्ति से होता है और स्वीडन के प्राणिविज्ञानी काई कुरी लिट्हल के अनुसार इस धरती की लगभग ३०० से अधिक जातियाँ तथा उपजातियाँ लुप्त हो चुकी है। यह भी अनुमान किया जाता है कि वर्तमान सदी में भूमंडल पर हर साल कही न कही एक जाति का लोप हो रहा है। अतएव जीवधारियों के इस विलुप्तीकरण का सीधा संबंध पर्यावरण से है, जो उनके प्रतिकूल बनता जा रहा है। इस प्रकार प्रतिकूल परिस्थितियों से जीवधारियों का अस्तित्व खतरे में है।