रहीम के दोहे
1.
"रहिमन विपदाहू भली, जो थोरे दिन होय ।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय ।।"
विपदा – संकट, परेशानी
हित-अनहित – मित्र व शत्रु, भला-बुरा
जानि परत – पहचान में आते हैं
👉 कठिनाई यदि थोड़े समय की हो तो अच्छी है क्योंकि उससे सच्चे और झूठे का ज्ञान हो जाता है।
2.
"जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग ।
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग ।।"
उत्तम प्रकृति – श्रेष्ठ स्वभाव वाला
कुसंग – बुरा साथ
चंदन – sandalwood
भुजंग – साँप
👉 जो महान स्वभाव के होते हैं, उन पर बुरी संगति असर नहीं करती – जैसे चंदन पर विषधारी साँप लिपटे रहते हैं, फिर भी चंदन विषैला नहीं होता।
3.
"जे गरीब पर हित करें, ते रहीम बड़ लोग ।
कहा सुदामा बापुरी , कृष्ण मिताई जोग ।। "
बड़ लोग – महान व्यक्ति
बापुरी – बेचारा, निर्धन
मिताई जोग – मित्रता के योग्य
👉 जो गरीबों का भला करें, वही सच्चे महान हैं – जैसे सुदामा गरीब था, फिर भी श्रीकृष्ण ने उसे सच्चा मित्र माना।
4.
"रहिमन छोटे तरन ते तजौं बैर और प्रीति ।
काटे चाटे स्वान के दुहूँ भाँति विपरीति ।।"
तरन – तृण, घास यहां (छोटे लोग)
स्वान – कुत्ता
दुहूँ भाँति – दोनों प्रकार से
विपरीति – उल्टा, बुरा परिणाम देने वाला
👉 नीच (छोटे) लोगों से न तो प्रेम करना चाहिए न ही शत्रुता – जैसे कुत्ता काटता भी है और चाटता भी, दोनों ही बुरा करते हैं।
5.
"रहिमन याचकता गहे, बड़े छोट है जात ।
नारायणहूँ को भयौ, बावन आँगुर गात ।।"
याचकता – माँगना, भीख माँगना
बड़े छोट है जात – बड़े भी छोटे हो जाते हैं
बावन – बावन (५२)
गात – शरीर
👉 माँगने से व्यक्ति का सम्मान जाता है – स्वयं भगवान विष्णु ने भी जब माँगा, तो उन्हें बौना (वामन) बनना पड़ा।
6.
"कदली सीप भुजंग मुख, जैसी संगति बैठिए,
स्वाति एक गुन तीन । तैसोई गुन दीन ।।"
कदली – केले का पेड़
सीप – शंख
भुजंग मुख – साँप का मुँह
स्वाति – स्वाति नक्षत्र की वर्षा
गुन – गुण
तैसोई – वैसा ही
दीन – दिया गया, उत्पन्न
👉 एक ही स्वाति नक्षत्र की वर्षा अलग-अलग संगति में अलग फल देती है – जैसे केले में रस, सीप में मोती, साँप में विष। संगति का प्रभाव पड़ता है।
7.
"रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि ।
जहां काम आवै सुई, क्या करै तरवारि ॥"
लघु – छोटा
डारि – त्याग देना
तरवारि – तलवार
👉 बड़े को देखकर छोटे को न छोड़ो – क्योंकि जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती।
8.
"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून ।
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुस, चून ।।"
पानी – (यहाँ) मान, आत्मसम्मान
सून – शून्य, व्यर्थ
ऊबरै – उबरना, बचना
मानुस – मनुष्य
चून – चूना
👉 जैसे जल के बिना जीवन नहीं, वैसे आत्मसम्मान के बिना कुछ भी नहीं बचता – चाहे वह मोती हो, मनुष्य हो या चूना।
9.
"जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय ।
बारे उजियारो करै, बढ़े अंधेरो होय ।।"
गति – दशा, स्थिति
दीप – दीपक
कुल कपूत – कुल का दुष्ट पुत्र
बारे – जन्म में, शुरुआत में
उजियारो – प्रकाश
अंधेरो – अंधकार
👉 कुल के दुष्ट संतान की दशा दीपक जैसी होती है – जन्म के समय प्रकाश फैलाता है (उम्मीदें देता है), लेकिन अंततः अंधकार (हानि) फैलाता है।
10.
"रहिमन वे नर मर चुके, जे कहूँ मांगन जाहिं ।
उनके पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं ।।"
मांगन जाहिं – मांगने जाते हैं
निकसत नाहिं – (जिनके मुँह से) नहीं निकलता
👉 जो व्यक्ति माँगने जाते हैं, वे मरे हुए जैसे हैं, और उनसे भी पहले वे मर चुके हैं जो अपने मुँह से कुछ कह ही नहीं सकते।
✅ रहीम के दोहों पर आधारित प्रश्नोत्तरी
प्रश्न 1
रहीम ने विपत्ति को "भली" क्यों कहा है?
उत्तर: क्योंकि विपत्ति के समय ही सच्चे मित्र और शत्रु की पहचान होती है।
प्रश्न 2
चंदन और भुजंग (साँप) के उदाहरण से रहीम क्या समझाना चाहते हैं?
उत्तर: अच्छे स्वभाव वाले व्यक्ति बुरी संगति में भी अपनी अच्छाई नहीं खोते, जैसे चंदन पर विषधर लिपटे रहने पर भी वह विषैला नहीं होता।
प्रश्न 3
सुदामा का उदाहरण देकर रहीम ने किस गुण की महत्ता बताई है?
उत्तर: गरीब व्यक्ति के साथ भी मित्रता करना महानता की निशानी है।
प्रश्न 4
रहीम छोटे लोगों से न प्रेम करने और न बैर करने की बात क्यों कहते हैं?
उत्तर: क्योंकि छोटे (नीच) लोग दोनों ही स्थिति में हानि पहुँचाते हैं – जैसे कुत्ता काटता भी है और चाटता भी है।
प्रश्न 5
याचकता (माँगना) से व्यक्ति की क्या हानि होती है, रहीम के अनुसार?
उत्तर: याचक बनने से व्यक्ति का आत्मसम्मान नष्ट होता है – यहाँ तक कि नारायण (भगवान) को भी वामन रूप लेना पड़ा।
प्रश्न 6
स्वाति नक्षत्र के जल की भिन्न प्रतिक्रियाओं से रहीम क्या समझाते हैं?
उत्तर: संगति का प्रभाव पड़ता है – जैसे वही जल केला, सीप और साँप में भिन्न परिणाम देता है।
प्रश्न 7
'जहाँ काम आवै सुई, क्या करै तरवारि' – इस दोहे का संदेश क्या है?
उत्तर: छोटे व्यक्ति या वस्तु को कभी तुच्छ न समझो – हर किसी की उपयोगिता होती है।
प्रश्न 8
‘पानी’ का प्रतीकात्मक अर्थ दोहे में क्या है?
उत्तर: आत्मसम्मान या प्रतिष्ठा। रहीम कहते हैं कि बिना आत्मसम्मान सब कुछ व्यर्थ है।
प्रश्न 9
कुल कपूत की तुलना दीपक से क्यों की गई है?
उत्तर: जैसे दीपक जलने के बाद अंत में अंधकार फैलाता है, वैसे ही कुल कपूत जन्म के समय आशा देता है पर अंततः विनाश करता है।
प्रश्न 10
'रहिमन वे नर मर चुके' दोहे में रहीम ने किस प्रकार के लोगों को मृत बताया है?
उत्तर: जो माँगने जाते हैं या जो मुँह से कुछ कह ही नहीं पाते – दोनों ही प्रकार के लोग आत्मसम्मानहीन माने गए हैं।
1. विपत्ति का महत्व
"रहिमन विपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।।"
अर्थ: रहीम कहते हैं कि थोड़े समय की विपत्ति (कठिन समय) अच्छी होती है, क्योंकि इसी के दौरान यह पता चलता है कि हमारे सच्चे मित्र और शत्रु कौन हैं। सुख के समय तो हर कोई साथ देता है, लेकिन कठिन समय में ही असली पहचान होती है।
2. अच्छी प्रकृति पर संगति का असर नहीं होता
"जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग।।"
अर्थ: उत्तम स्वभाव वाले व्यक्ति पर बुरी संगति का प्रभाव नहीं पड़ता। जैसे चंदन के पेड़ पर साँप लिपटे रहते हैं, लेकिन फिर भी चंदन विषैला नहीं होता। इसी तरह, सच्चे और अच्छे लोग किसी भी परिस्थिति में अपनी अच्छाई नहीं खोते।
3. परोपकारी ही महान होते हैं
"जे गरीब पर हित करें, ते रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरी, कृष्ण मिताई जोग।।"
अर्थ: जो लोग गरीबों की मदद करते हैं, वही वास्तव में बड़े और महान कहलाते हैं। जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने गरीब सुदामा की मित्रता निभाई और उसकी सहायता की। इसलिए सच्ची महानता दूसरों की मदद करने में है।
4. छोटे और नीच लोगों से न तो प्रेम करो, न ही बैर
"रहिमन छोटे तरन ते तजौं बैर और प्रीति।
काटे चाटे स्वान के, दुहूँ भाँति विपरीति।।"
अर्थ: छोटे और नीच स्वभाव के लोगों से न तो प्रेम करना चाहिए और न ही शत्रुता। जैसे कुत्ता किसी को काट सकता है और चाट भी सकता है, लेकिन दोनों ही स्थितियाँ नुकसानदायक होती हैं।
अथवा
कम दिमाग के व्यक्तियों से ना तो प्रीती और ना ही दुश्मनी अच्छी होती है। जैसे कुत्ता चाहे काटे या चाटे दोनों को विपरीत नहीं माना जाता है।
5. याचना करने से व्यक्ति का सम्मान कम होता है
"रहिमन याचकता गहे, बड़े छोट है जात।
नारायणहूँ को भयौ, बावन आँगुर गात।।"
अर्थ: जो व्यक्ति भीख माँगता है या किसी से जरूरत से ज्यादा कुछ माँगता है, उसका सम्मान कम हो जाता है। यहाँ तक कि भगवान विष्णु ने भी जब बलि से तीन पग भूमि माँगी और वामन रूप धारण किया, तो उन्हें भी छोटा रूप लेना पड़ा। इसलिए माँगना हमेशा व्यक्ति के कद को छोटा कर देता है।
6. संगति का प्रभाव
"कदली सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई गुन दीन।।"
अर्थ: स्वाति नक्षत्र की बूंद अगर केले के पेड़ पर गिरे तो वह सामान्य जल बन जाती है, अगर सीप में गिरे तो मोती बनती है, और अगर साँप के मुँह में गिरे तो विष बन जाती है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति जिस संगति में रहता है, वैसा ही बन जाता है।
7. छोटे व्यक्ति की भी अपनी उपयोगिता होती है
"रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहां काम आवै सुई, क्या करै तरवारि।।"
अर्थ: हमें छोटे व्यक्ति को कभी तुच्छ नहीं समझना चाहिए, क्योंकि हर किसी की अपनी उपयोगिता होती है। जैसे सिलाई के लिए तलवार नहीं बल्कि सुई की जरूरत होती है। इसलिए हर व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए।
8. जीवन में पानी (सम्मान) बनाए रखना जरूरी है
"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुस, चून।।"
अर्थ: रहीम दास जी कह रहे हैं कि पानी को बचाकर रखना चाहिए, क्योंकि इसके बिना सब कुछ बेकार है। यहाँ "पानी" शब्द का प्रयोग सामान्य अर्थ में जल के लिए किया गया है, जो जीवन के लिए आवश्यक है।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुस, चून
इस पंक्ति में, "पानी" शब्द के तीन अलग-अलग अर्थ हैं:
मोती: मोती के लिए, "पानी" का अर्थ है चमक या आभा। जब मोती का पानी सूख जाता है, तो उसकी चमक चली जाती है और वह बेकार हो जाता है।
मानुस (मनुष्य): मनुष्य के लिए, "पानी" का अर्थ है प्रतिष्ठा, सम्मान, या स्वाभिमान। जब मनुष्य अपनी प्रतिष्ठा खो देता है, तो वह समाज में सम्मान खो देता है।
चून (चूना) : चूने के लिए, "पानी" का अर्थ है जल। चूने को पानी में मिलाने से ही वह काम आता है।
9. कुल (वंश) और कुपुत्र का अंतर
"जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करै, बढ़े अंधेरो होय।।"
अर्थ: रहीम कहते हैं कि अच्छे कुल का एक कुपुत्र (बिगड़ा बेटा) वैसे ही होता है जैसे दीपक की लौ। छोटा हो तो उजाला करता है, लेकिन जब बढ़ जाता है (बढ़ती आग की तरह) तो अंधेरा फैलाता है और विनाश करता है। इसलिए वंश का गौरव बनाए रखना जरूरी है।
प्रस्तुत पंक्तियों में श्लेष अलंकार है |
श्लेष अलंकार में एक शब्द के दो अर्थ निकलते हैं। 1) बारे = बचपन में तथा जलाने पर इस संदर्भ में अर्थ लिया गया है | 2) बढ़े = बड़ा होने पर तथा बुझने पर|
यहाँ प्रस्तुत दीप के जलने में अप्रस्तुत बुरे पुत्र का आरोप किया गया है।
जिस प्रकार दीपक के जलने की गति से तेल समाप्त हो जाता है उसी प्रकार एक बुरा पुत्र सम्पूर्ण कुल को नष्ट कर देता है।
श्लेष अलंकार में एक शब्द के दो अर्थ निकलते हैं। यहाँ भी दीप के निकल ही रहे हैं। यहाँ पर दीपक के दो अर्थ - एक दीया और दूसरा कुल दीपक अर्थात् पुत्र ।
10. भीख माँगना अपमानजनक है
"रहिमन वे नर मर चुके, जे कहूँ मांगन जाहिं।
उनके पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।।"
अर्थ: जो लोग भीख माँगते हैं, वे पहले ही मर चुके होते हैं, क्योंकि उनका आत्म-सम्मान खत्म हो चुका होता है। माँगने से मनुष्य का मान-गौरव नीचे गिर जाता है |
लेकिन, उनके भी पहले वे नर मर चुके हैं, जो माँगने पर नहीं कह देते हैं | अर्थात यदि किसी ने विवशतावश कुछ माँग ही दिया है तो उसे दे देना चाहिए |