Friday, March 28, 2025

वंदना के इन स्वरों में

 


                 6. वंदना के इन स्वरों में


                              - कवि सोहनलाल द्विवेदी


वंदना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो ।


तब कभी माँ को न भूलो; राग में जब मत्त झूलो;


अर्चना के रत्नकण में एक कण मेरा मिला लो।



जब हृदय का तार बोले, श्रृंखला के बन्ध खोले;


हों जहां बलि शीश अगणित, एक शिर मेरा मिला लो ।



भावार्थ:


कवि सोहनलाल द्विवेदी ने इस कविता में अपनी मातृभूमि और भक्ति के प्रति गहरी आस्था व्यक्त की है। वे चाहते हैं कि उनकी वाणी भी वंदना के स्वरों में शामिल हो जाए, जिससे उनकी भक्ति भी अमर हो जाए। उन्होंने राष्ट्रप्रेम, त्याग और बलिदान को महत्व देते हुए अपनी मातृभूमि के लिए सर्वस्व अर्पित करने की भावना व्यक्त की है।


"वंदना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो।"


कवि चाहते हैं कि जब भी भक्ति और वंदना के स्वर गूंजें, उनमें उनका स्वर भी सम्मिलित हो, जिससे वे भी इस महान कार्य का हिस्सा बन सकें।


"तब कभी माँ को न भूलो; राग में जब मत्त झूलो;"


कवि कहते हैं कि जब भी जीवन में आनंद और उल्लास का समय आए, तब भी मातृभूमि को नहीं भूलना चाहिए। हमें हमेशा अपने कर्तव्यों को याद रखना चाहिए।


"अर्चना के रत्नकण में एक कण मेरा मिला लो।"


जैसे अर्चना में रत्नों का महत्व होता है, वैसे ही कवि चाहते हैं कि उनके समर्पण और त्याग का एक छोटा-सा अंश भी राष्ट्र की सेवा में गिना जाए।


"जब हृदय का तार बोले, श्रृंखला के बन्ध खोले;"


जब मनुष्य का हृदय सच्ची भावना से प्रेरित होकर बोले, तब सभी बंधनों को तोड़कर वह स्वतंत्रता और सेवा के मार्ग पर चलने को तैयार हो जाता है।


"हों जहां बलि शीश अगणित, एक शिर मेरा मिला लो।"


कवि राष्ट्र के लिए बलिदान की महिमा बताते हुए कहते हैं कि जहां असंख्य वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, वहां उनका भी सिर समर्पित हो जाए।





सारांश:


इस कविता में कवि ने राष्ट्रभक्ति, बलिदान और समर्पण की भावना व्यक्त की है। वे चाहते हैं कि उनका भी योगदान मातृभूमि की सेवा में गिना जाए। वे मातृभूमि की वंदना में अपनी वाणी मिलाने, उसकी पूजा में अपना अंश जोड़ने और बलिदानियों की पंक्ति में अपना सिर देने की इच्छा व्यक्त करते हैं। कविता हमें सिखाती है कि हमें अपने देश के प्रति हमेशा समर्पित रहना चाहिए और राष्ट्र के गौरव के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।


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