"बढ़े चलो"
(पद्मकान्त मालवीय)
भावार्थ
1.
"चले चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो, चले चलो।
प्रचंड सूर्य-ताप से, न तुम जलो, न तुम गलो।।"
भावार्थ:
कवि हमें प्रेरित करते हैं कि चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएँ, हमें हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए। तेज धूप या कठिन परिस्थितियाँ हमारा रास्ता नहीं रोक सकतीं। हमें धैर्य और साहस के साथ अपनी मंजिल की ओर बढ़ते रहना चाहिए।
2.
"हृदय से तुम निकाल दो अगर हो पस्त हिम्मती।
नहीं है खेल मात्र ये, ये जिंदगी है जिंदगी।।"
भावार्थ:
यदि हमारे मन में डर या निराशा है, तो उसे त्याग देना चाहिए। जीवन कोई खेल नहीं है, बल्कि एक वास्तविक संघर्ष है, जिसमें हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना आवश्यक है।
3.
"न रक्त है, न स्वेद है, न हर्ष है, न खेद है,
ये जिंदगी अभेद है, यही तो एक भेद है।
समझ के सब चले चलो, कदम-कदम बढ़े चलो।।"
भावार्थ:
जीवन में न तो सिर्फ खुशी है और न ही केवल दुख। यह जीवन एक ऐसा रहस्य है, जिसे समझकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। इसलिए बिना रुके और बिना डरे, अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ते रहो।
4.
"पहाड़ से चली नदी, रुकी नहीं कहीं जरा।
गई जिधर उधर किया जमीन को हरा-भरा।।"
भावार्थ:
कवि यहाँ नदी का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जैसे नदी अपने मार्ग में आने वाली किसी भी बाधा से नहीं रुकती और जहाँ से गुजरती है, वहाँ हरियाली फैलाती है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए। हमें लगातार आगे बढ़ते रहना चाहिए।
5.
"चली समान रूप से, मगन रही निनाद में,
उसी तरह चले चलो, जमीन का न ख्याल कर,
जमीन पर, पहाड़ पर, उसी तरह बढ़े चलो।।"
भावार्थ:
जिस प्रकार नदी बिना किसी भेदभाव के, समान भाव से बहती रहती है, उसी तरह हमें भी हर परिस्थिति में समान रूप से आगे बढ़ना चाहिए। चाहे रास्ता समतल हो या पहाड़ी, हमें बिना थके चलते रहना चाहिए।
6.
"जलाओ दिल के दाग से बुझे दिलों के दीप को।
जो दूर हैं उन्हें भी खींच लो जरा समीप को।।"
भावार्थ:
अपने जीवन के संघर्षों से मिली प्रेरणा से दूसरों की सहायता करनी चाहिए। जो लोग दुखी या हतोत्साहित हैं, उन्हें अपने साहस और प्रेम से करीब लाना चाहिए और उनके दिलों में आशा की ज्योति जलानी चाहिए।
7.
"सहो जमीन की तरह, जलो तो आन बान से,
डरो न आसमान से, बुझो तो एक शान से।
अखंड-दीप से जलो, सदा-बहार से खिलो।।"
भावार्थ:
हमें धरती की तरह सहनशील होना चाहिए और अगर जलना पड़े (संघर्ष करना पड़े), तो गर्व और सम्मान के साथ जलना चाहिए। किसी भी कठिनाई से डरना नहीं चाहिए और यदि हार भी जाओ, तो शान के साथ हारो। हमें हमेशा एक अखंड दीपक की तरह जलते रहना चाहिए और हर परिस्थिति में मुस्कराते रहना चाहिए।
8.
"बिना पिए रहे नशा, न चढ़के वो उतर सके।
जुनून वह सवार हो कि जा न उम्र भर सके।।"
भावार्थ:
हमारे अंदर ऐसा उत्साह और जुनून होना चाहिए, जो बिना किसी बाहरी साधन के भी हमेशा बना रहे। यह जुनून इतना गहरा होना चाहिए कि जीवन भर खत्म न हो।
9.
"वो काम तुम करो यहां, जो दूसरा न कर सके।
कोई तुम्हारी शान से, न जी सके, न मर सके।
समीर से चले चलो, समीर से बहे चलो।।"
भावार्थ:
हमें ऐसे अद्वितीय कार्य करने चाहिए, जिन्हें कोई और न कर सके। हमारा जीवन इतना महान होना चाहिए कि हमारी तरह कोई न जी सके और न ही हमारी तरह मर सके। हमें हवा की गति से आगे बढ़ना चाहिए और हर बाधा को पार करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचना चाहिए।
कविता का सार:
कवि इस कविता के माध्यम से हमें जीवन में कभी हार न मानने की प्रेरणा देते हैं। चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, हमें बिना रुके और बिना थके आगे बढ़ते रहना चाहिए। जैसे नदी अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं से नहीं रुकती, वैसे ही हमें भी दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ना चाहिए। आत्मविश्वास, धैर्य और साहस से हम अपने जीवन को महान बना सकते हैं।
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