Sunday, March 16, 2025

दोनों ओर प्रेम पलता है।

 


कविता: दोनों ओर प्रेम पलता है

— मैथिलीशरण गुप्त


1. पंक्ति:

"दोनों ओर प्रेम पलता है।

सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है।"


भावार्थ:

कवि कहते हैं कि प्रेम में केवल एक पक्ष ही नहीं, बल्कि दोनों पक्ष समान रूप से पीड़ा सहते हैं। जैसे दीपक जलकर प्रकाश देता है और पतंग उसकी लौ में जलकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही प्रेम में दोनों पक्षों को दुख और त्याग सहना पड़ता है। प्रेम में एकतरफा बलिदान नहीं होता, दोनों ही प्रेमी अपने-अपने तरीके से कष्ट झेलते हैं।


2. पंक्ति:

"सीस हिलाकर दीपक कहता—

'बन्धु, वृथा ही तू क्यों दहता?'

पर पतंग पड़कर ही रहता!

कितनी विह्वलता है।"


भावार्थ:

दीपक पतंग से कहता है कि वह व्यर्थ ही अपनी जान जोखिम में डाल रहा है। लेकिन पतंग प्रेम में इतना समर्पित है कि दीपक की चेतावनी को अनसुना कर अपनी बलि देने को तैयार रहता है। यह प्रेम की वह अवस्था है, जहां तर्क और चेतावनी काम नहीं करते, केवल समर्पण ही दिखाई देता है।


3. पंक्ति:

"बच कर हाय! पतंग करे क्या?

प्रणय छोड़कर प्राण धरे क्या?

जले नहीं तो मरा करे क्या?

क्या यह असफलता है?"


भावार्थ:

कवि कहते हैं कि प्रेम में समर्पण किए बिना जीने का कोई अर्थ नहीं है। पतंग के लिए दीपक में जलकर समाप्त होना ही उसका प्रेम है। यदि वह प्रेम में जलता नहीं है, तो उसका जीवन व्यर्थ है। यह प्रेम की चरम अवस्था को दर्शाता है, जहां प्रिय के बिना जीवन शून्य लगने लगता है।


4. पंक्ति:

"कहता है पतंग मन मारे,

'तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,

क्या न मरण भी हाथ हमारे!

शरण किसे छलता है?'"


भावार्थ:

पतंग विनम्रता से दीपक से कहता है कि तुम महान हो, मैं छोटा हूं, लेकिन तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम सच्चा है। प्रेम में छोटा-बड़ा कुछ नहीं होता, और मेरे पास अपना जीवन समर्पित करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। प्रेम में मृत्यु भी प्रिय होती है।


5. पंक्ति:

"दीपक के जलने में आली,

फिर भी है जीवन की लाली,

किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,

किसका वश चलता है?"


भावार्थ:

दीपक जलते हुए भी प्रकाश फैलाता है और उसका जीवन सार्थक लगता है, लेकिन पतंग का भाग्य दुखद है क्योंकि वह प्रेम में जलकर समाप्त हो जाता है। प्रेम में भाग्य का कोई नियंत्रण नहीं होता—किसी का जीवन संवरता है, तो किसी की नियति में विनाश लिखा होता है।


6. पंक्ति:

"जगती वणिग्वृत्ति है रखती,

उसे चाहती जिससे चखती,

काम नहीं, परिणाम निरखती,

मुझे यही खलता है।"


भावार्थ:

कवि संसार की स्वार्थी प्रवृत्ति पर कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि यह दुनिया केवल उसी से प्रेम करती है, जिससे उसे लाभ मिलता है। संसार परिणाम को देखता है, लेकिन निःस्वार्थ प्रेम की भावना को नहीं समझता। यही बात कवि को पीड़ा पहुंचाती है, क्योंकि सच्चा प्रेम त्याग और बलिदान मांगता है, जिसे दुनिया महत्व नहीं देती।


**कविता का केंद्रीय भाव:

यह कविता प्रेम में त्याग, समर्पण और बलिदान की अनिवार्यता को दर्शाती है। जैसे दीपक और पतंग दोनों ही प्रेम में जलते हैं, वैसे ही सच्चे प्रेम में दोनों पक्ष पीड़ा सहते हैं। यह कविता निःस्वार्थ प्रेम की महानता को स्थापित करती है और स्वार्थी समाज की मानसिकता पर प्रश्न उठाती है।




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