Tuesday, April 29, 2025

पाप के चार हथियार ,पाठ के प्रश्न और उत्तर

  पाठ - पाप के चार हथियार 


लघुत्तरी या संक्षिप्त प्रश्न और उनके उत्तर


प्रश्न १ लेखक ने जार्ज बर्नाड शॉ का कौन सा पैराग्राफ (अनुच्छेद) अपने निबंध में प्रस्तुत किया है। 

अथवा

जार्ज बर्नाड शॉ ने अपने पैराग्राफ में क्या लिखा है ? 


उत्तर - जार्ज बर्नाड शॉ ने अपने पैराग्राफ (अनुच्छेद) में शॉ  लिखा है कि मैं हमेशा अपने यहाँ की रूढ़ियों, परंपराओं और मान्यताओं के विरुद्ध लिखता रहा हूँ। यदि लोग मेरे एक शब्द पर भी ध्यान दें, तो संपूर्ण समाज का ढाँचा डगमगा सकता है और लोग मेरे विरुद्ध खड़े हो सकते हैं। यहाँ तक कि लोग खुली सड़क पर कोड़ों से मेरी पिटाई भी कर सकते है परंतु मैं इतना भाग्यशाली हूँ कि लोग मेरी बातों को गंभीरता से नहीं लेते। शॉ ने यह भी लिखा है कि वे उन्हें हँसकर टाल देते हैं और वे मुझ पर हँसते हैं तथा इसीलिए मुझे बर्दाश्त कर लेते हैं अन्यथा वे मेरी मानसिक और नैतिक महत्ता को कभी भी बरदाश्त नहीं कर सकते।


प्रश्न २ - संसार में पाप तथा अन्य दोषों का प्रभाव देखकर लेखक के मन में कौन सा प्रश्न उठता है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने पर लेखक किस निष्कर्ष पर पहुंचता है?


उत्तर- लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' ने 'पाप के चार हथियार' निबंध के प्रारंभ में लिखा है कि संसार में जहाँ देखो, वहाँ पाप है और लोगों के जीवन में अनेक दोष भी दिखाई देते हैं। साथ ही हमारी सामाजिक व्यवस्था में अन्याय है और हमारे व्यवहारों में भी अत्याचार है। विचारपूर्वक देखा जाय तो यह स्थिति बहुत पहले से थी और आज भी उसी रूप में बनी हुई है।

लेखक के अनुसार संसार में जाने कितने महान पुरुष, सुधारक, दार्शनिक, पैगंबर, संत, अवतार और तीर्थकर आदि हो चुके हैं। उन्होंने अपने आचार-व्यवहार और उपदेशों आदि से मानव-मात्र को निर्मल तथा पापरहित जीवन का मार्ग दिखाया है। अतएव उनसे प्रभावित होकर बहुत से लोग उनके अनुयायी बन गए और उन्होंने उनकी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार भी किया।

यद्यपि महान पुरुषों और सुधारकों के प्रहार से विडंबनाएँ टूटती-बिखरती दिखाई देती हैं लेकिन कुछ समय बाद, वे पुनः पहले के समान काम करने लगती है। इस तरह संसार से पाप, अन्याय, अत्याचार तथा अव्यवस्था का पूर्ण रूप से अंत नहीं हो जाता और लोगों की पापवृत्ति पहले के समान बनी रहती है। लेखक ने इसका कारण स्पष्ट करते हुए लिखा है कि शायद पुण्य और विडंबनाओं के पास कोई ऐसी शक्ति है, जिसके बल पर वे महान पुरुषों और सुधारकों का सशक्त आक्रमण झेल जाते हैं तथा वे पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होते।

लेखक के कहने का अभिप्राय यह है कि लोगों में छुपा हुआ पाप का भाव इतना अधिक शक्तिशाली है कि उसके सामने सुधारकों का प्रयत्न चिकने घड़े पर पानी डालने के समान सिद्ध होता है।


प्रश्न ३- लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' ने पाप के संबंध में क्या अभिप्राय व्यक्त किया है।

अथवा

संक्षेप में बतलाइए कि पाप के चार हथियार कौन-कौन से हैं और पाप उनका उपयोग किस प्रकार करता है?

उत्तर -

लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' ने मानव जीवन का गहरा अध्ययन करने के पश्चात यह सार प्रस्तुत किया है कि पाप की सत्ता बहुत बलवान है और पाप के पास उपेक्षा, निंदा, हत्या एवं श्रद्धा नामक चार ऐसे हथियार हैं. जिनके बल पर उसकी सत्ता टिकी हुई है। लेखक के अनुसार आरंभ में पाप और उसका प्रतिनिधि समाज सच्चे सुधारक की बातों की उपेक्षा करते हैं तथा वह उन्हें हँसकर टाल देता है।

अपनी इस उपेक्षा से सुधारक जरा भी विचलित नहीं होता बल्कि वह कुछ अधिक पैने और ऊँचे स्वर में सत्य को स्पष्ट करता है। यह देखकर पाप और उसका प्रतिनिधि समाज उस सुधारक की निंदा करने लगता है। अपनी इस निंदा से सच्चा सुधारक हताश नहीं होता बल्कि उसका सत्य पहले से भी अधिक तीक्ष्ण हो जाता है।

जब पाप और उसका प्रतिनिधि समाज, सुधारक के सत्य को सहन नहीं कर पाते, तव वे मौका पाकर उसकी (सुधारक की) हत्या करवा देते हैं। यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि सुकरात को जहर, ईसा को सूली, दयानंद को पिसा हुआ काँच और गांधी को गोली मिलती है। इतना अवश्य है कि यह शहादत सुधारक के नाम को पहले से भी अधिक प्रतापी और तेजस्वी बना देती है।

यह देखकर कि अपने तीन हथियार बेकार हो गए और सुधारक का प्रभाव कम नहीं हो सका, पाप तथा उसका प्रतिनिधि पापी समाज अपने अंतिम ब्रह्मास्र का उपयोग करता है। इस प्रकार पाप सुधारक के प्रति श्रद्धा नामक चौथे हथियार का प्रयोग करता है और वह उस सुधारक की जय-जयकार करता है तथा अब उसे अर्थात सुधारक को भगवान बतलाकर उसके मंदिर और स्मारक आदि बनाये जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि लोग उस सुधारक के उपदेशों को भूल जाते हैं तथा उसकी पूजा करने लगते हैं।


प्रश्न ४- पाप के चार हथियारों में से उपेक्षा और निंदा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।


उत्तर - समाज में सुधार लानेवाले सुधारकों को परास्त और असफल बनाने के लिए पाप के पास उपेक्षा, निंदा, हत्या तथा श्रद्धा नामक चार हथियार है। इनके बल पर ही पाप की सत्ता टिकी हुई है।

लेखक के अनुसार जब सुधारक समाज में सुधार करने का कार्य आरंभ करता है, तब पाप अपने पहले हथियार उपेक्षा का उपयोग करता है। इस प्रकार वह सुधारक के कामों को उपेक्षा करता है और उसके विचारों की ओर बिलकुल ध्यान न देकर उसकी बातों को पागल को बड़बड़ कहता है। पाप का नारा होता है 'अरे छोड़ो इसे और अपना काम करो।’

लेखक ने यह भी कहा है कि अपनी उपेक्षा से सुधारक का तेज और अधिक बढ़ जाता है तथा वह पाप के उपेक्षा भाव की अवहेलना कर, अपने काम पर अडिग रहता है। यह देखकर पाप निंदा नामक हथियार का उपयोग करता है और वह सुधारक की निंदा करता है तथा उसे गालियां भी देता है। अब पाप सुधारक को बेवकूफ और पागल कहकर, उस पर यह आरोप भी लगाता है कि वह लोगों को ठगता है। इस प्रकार पाप उपेक्षा और निंदा नामक हथियारों से सुधारक को परास्त करने का प्रयास करता है।


प्रश्न ५ • पाप कब और क्यों सुधारक की वंदना करने लगता है? उसका क्या परिणाम होता है? संक्षेप में बतलाइए।

अथवा

संक्षेप में लिखिए कि सुधारक की हत्या का क्या परिणाम होता है? पाप या पापी समाज अब इस स्थिति का सामना किस प्रकार करता है?


उत्तर -  पाप या पापी समाज के निम्नलिखित चार हथियार माने गए हैं -उपेक्षा, निंदा, हत्या और श्रद्धा। इन्हीं के बल पर पाप की सत्ता टिकी रहती है और पाप इनका क्रमानुसार प्रयोग कर सुधारक के सत्य को प्रभावहीन कर देता है। इनमें से पाप सबसे पहले उपेक्षा और निंदा नामक हथियारों का प्रयोग करता है।

जब इन दोनों से वह सुधारक का प्रभाव कम नहीं कर पाता, तब पाप आतंकित होकर उस सुधारक की हत्या करवा देता है। हत्या से उस सुधारक का महत्त्व कम नहीं होता क्योंकि सुधारक की शहादत उसके नाम में वह शक्ति और प्रताप भर देती है, जो उसे जीवित रहते समय भी प्राप्त नहीं थी। इस प्रकार सुधारक की हत्या के पश्चात उसके अनुयायी आवेश में आकर, उसके उपदेशों और विचारों को जन-जन तक पहुँचाने लगते हैं।

इस स्थिति से भयभीत होकर पाप अपना ब्रह्मास्त्र चलाता है और वह ब्रह्मास्त्र है श्रद्धा। अब पाप भी उस सुधारक की जय-जयकार करने लगता है और वह उस मृत सुधारक को भगवान घोषित कर देता है। साथ ही पाप उस मृत सुधारक के सभी सिद्धांतों, कार्यों और आदर्शों को लोकोत्तर घोषित कर देता है। इसलिए लोग उस सुधारक की जयंतियाँ मनाते हैं और उसके मंदिर तथा स्मारक आदि भी बनाए जाते हैं तथा उस सुधारक की महिमा के ग्रंथ भी प्रकाशित किए जाते हैं।

इन सब बातों का परिणाम यह होता है कि उस सुधारक के संदेशों की आत्मा गायब हो जाती है और धीरे-धीरे लोग सुधारक के सत्य को भूल जाते हैं। ऐसी दशा में पाप को फिर से फलने-फूलने का अवसर प्राप्त हो जाता है और पाप का यह ब्रह्मास्त्र श्रद्धा संसार में सर्वत्र सफल रहा है। लेखक के अनुसार पाप का यह ब्रह्मास्त्र अतीत में अजेय रहा है और वह वर्तमान में भी अजेय है। इतना ही नहीं वह भविष्य में भी इसी प्रकार सुधारकों का प्रभाव कम करके स्वयं शक्तिशाली बना रहेगा।


प्रश्न ६ पाप का अंतिम अस्त्र कौन सा है? उसका उपयोग समाज कब करता है ?

अथवा

पाप का ब्रह्मास्त्र क्या है? पाप इस अस्त्र का प्रयोग कब और किस प्रकार करता है?

उत्तर - वास्तव में पाप के उपेक्षा, निंदा, हत्या और श्रद्धा नामक चार हथियार माने गए हैं। समाज इनमें से पहले तीन का क्रमशः उपयोग करके सुधारक को परास्त करने का प्रयत्न करता है। किंतु उनके उपयोग से सुधारक का प्रभाव कम नहीं होता बल्कि पहले से भी अधिक बढ़ जाता है।

ऐसी दशा में पाप अपने अंतिम अस्र श्रद्धा का उपयोग करता है और श्रद्धा कप व्यर्थ न जानेवाला ब्रह्मास्त्र सिद्ध होता है। वह पाप के उद्देश्य को निश्चित रूप से सफल बनाता है और अब सुधारक के प्रति असीम श्रद्धा व्यक्त कर उसकी जय-जयकार की जाती है। इस प्रकार सुधारक को महान पुरुष, संत, अवतार और भगवान आदि बतलाकर उसके सिद्धांतों और आदर्शों को लोकोत्तर घोषित किया जाता है। साथ ही समाज उसकी जयंतिया मनाता है और उस सुधारक के स्मारक तथा मंदिर भी बनाए जाते हैं। इतना ही नहीं उसके गौरव ग्रंथ भी प्रकाशित किए जाते हैं। इन सब कार्यों के बीच लोग सुधारक के महान विचार, संदेश और सिद्धांत आदि भूल जाते हैं तथा श्रद्धा की इस भावना के फलस्वरूप पाप को फिर से फलने-फूलने का अवसर मिल जाता है। इस प्रकार समाज पाप के अंतिम ब्रम्हास्त्र श्रद्धा का उपयोग कर सुधारक के सत्य को पराजित कर देता है।



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