Wednesday, April 16, 2025

गीत फरोश - भावार्थ , प्रश्न उत्तर

 गीत फरोश - भावार्थ 

यह कविता श्री भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित है, जिसमें एक कवि की विवशता और समाज की वास्तविकता को दर्शाया गया है। कवि स्वयं को एक "गीत फरोश" यानी गीत बेचने वाला बताता है और अपनी कविताओं को बेचने की मजबूरी और उसके विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत करता है।


पंक्तियाँ और भावार्थ:


जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ। मैं तरह - तरह के गीत बेचता हूँ; मैं सभी किसिम के गीत बेचता हूँ।


भावार्थ: कवि सीधे-सादे ढंग से अपनी पहचान बताता है कि वह एक गीत बेचने वाला है। वह कहता है कि उसके पास विभिन्न प्रकार के और हर किस्म के गीत उपलब्ध हैं। यह पंक्तियाँ कविता के मुख्य विषय को स्थापित करती हैं।


जी, माल देखिये दाम बताऊँगा, बेकाम नहीं है, काम बताऊँगा; कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने, कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने; यह गीत, सख्त सरदर्द भुलायेगा; यह गीत पिया को पास बुलायेगा।


भावार्थ: कवि अपने गीतों को एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत करता है और संभावित खरीदार से कहता है कि वह गीतों को देखे, वह उनका दाम बताएगा। वह यह भी दावा करता है कि उसके गीत बेकार नहीं हैं, बल्कि उपयोगी हैं। वह बताता है कि कुछ गीत उसने आनंद और मस्ती में लिखे हैं, तो कुछ दुख और निराशा की स्थिति में रचे हैं। वह अपने गीतों के विशिष्ट उपयोग भी बताता है कि एक गीत भयंकर सिरदर्द को दूर कर सकता है, तो दूसरा प्रिय को पास लाने में सहायक हो सकता है।


जी पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको 

पर पीछे-पीछे अक्ल जगी मुझको, 

जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान 

जी आप न हों सुनकर ज्यादा हैरान 

मैं सोच समझकर आखिर अपने गीत बेचता हूँ; 

जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ।


भावार्थ: कवि अपनी इस कर्म (गीत बेचने) को लेकर पहले शर्मिंदा था, लेकिन बाद में उसे समझ में आया कि जब लोग अपना ईमान तक बेच देते हैं, तो उसे अपने गीतों को बेचने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। वह तर्क देता है कि उसने सोच-समझकर ही यह पेशा अपनाया है। वह फिर दोहराता है कि वह गीत बेचता है। यहाँ समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और मूल्यों के पतन की ओर इशारा किया गया है।

यह गीत सुबह का है, गाकर देखें,

यह गीत गजब का है, ढाकर देखें; 

यह गीत जरा सूने में लिक्खा था; 

यह गीत वहाँ पूने में लिक्खा था।


भावार्थ: कवि अपने गीतों के बारे में और जानकारी देता है। वह कहता है कि एक गीत सुबह के शांत वातावरण के लिए उपयुक्त है और उसे गाकर देखना चाहिए। दूसरे गीत को वह अद्भुत बताता है और उसे आजमाकर देखने की सलाह देता है। वह गीतों की रचना के स्थान और समय का भी उल्लेख करता है, जैसे कि एक गीत सुनसान जगह पर लिखा गया था और दूसरा पुणे शहर में।

**यह गीत पहाड़ों पर चढ़ जाता है, यह गीत बढ़ाये से बढ़ जाता है,

यह गीत भूख और प्यास भगाता है; जी, यह मसान में भूत जगाता है।**

भावार्थ: कवि अपने गीतों की अतिशयोक्तिपूर्ण विशेषताएँ बताता है। वह कहता है कि एक गीत इतना प्रभावशाली है कि वह पहाड़ों पर चढ़ने की शक्ति देता है और बार-बार सुनने पर उसकी महत्ता बढ़ती जाती है। वह आगे बढ़कर यह भी कहता है कि एक गीत भूख और प्यास को मिटा सकता है, और यहाँ तक कि श्मशान में मुर्दों को भी जगा सकता है। यह हास्य और व्यंग्य का मिश्रण है।


यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर 

यह गीत तपेदिक की है दवा हुजूर ।


भावार्थ: कवि अपने गीतों को विशिष्ट स्थानों और समस्याओं से जोड़ता है। वह कहता है कि एक गीत भुवाली (उत्तराखंड का एक हिल स्टेशन) की ताज़ी हवा जैसा है, और दूसरा गीत तपेदिक (टीबी) जैसी गंभीर बीमारी का इलाज कर सकता है। यह गीतों की चमत्कारी शक्तियों का दावा है।


मैं सीधे साधे और अटपटे, गीत बेचता हूँ, 

जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।


भावार्थ: कवि स्वयं को एक साधारण और कुछ अजीब तरह का गीत बेचने वाला बताता है और फिर अपनी पहचान दोहराता है।


जी, और गीत भी हैं, दिखलाता हूँ; 

जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ, 

जी, छन्द और बेछन्द पसन्द करें- 

जी, अमर गीत और वे जो तुरत मरें। 

ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात, 

मैं पास रखे हूँ कलम और दावात 

इसमें से भाये नहीं, नये लिख दूँ? 

जी, नये चाहिये नहीं, गये लिख दूँ। 

इन दिनों की दुहरा है कवि - धंधा, 

हैं दोनों चीजें व्यस्त, कलम - कंधा। 

कुछ घण्टे लिखने के, कुछ फेरी के जी, 

दाम नहीं लूँगा इस देरी के। 

मैं नये - पुराने सभी तरह के गीत बेचता हूँ। 

जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।


भावार्थ: कवि अपने गीतों का और संग्रह दिखाता है और कहता है कि यदि ग्राहक चाहे तो वह उन्हें गाकर भी सुना सकता है। वह पूछता है कि ग्राहक छंदबद्ध गीत पसंद करेंगे या छंदमुक्त, अमर गीत चाहेंगे या वे जो जल्द ही भुला दिए जाएँ। वह कहता है कि इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है, क्योंकि उसके पास हमेशा कलम और स्याही तैयार रहती है। यदि ग्राहक को मौजूदा गीत पसंद नहीं आते हैं, तो वह नए लिख सकता है, या यदि नए नहीं चाहिए तो जो बीत गए हैं, उन्हें लिख सकता है (अर्थात् पुराने गीतों को फिर से लिख सकता है)। वह बताता है कि आजकल कवि का काम दोहरा हो गया है - कुछ समय लिखने में और कुछ समय उन्हें बेचने में बीतता है, इसलिए उसकी कलम और कंधा दोनों व्यस्त रहते हैं। यदि गीत दिखाने या सुनाने में थोड़ी देर हो जाए तो वह उसका दाम नहीं लेगा। अंत में वह फिर कहता है कि वह नए और पुराने सभी तरह के गीत बेचता है।


जी, गीत जनम का लिखूँ, मरन का लिखूँ; 

जी, गीत जीत का लिखूँ शरण का लिखूँ 

यह गीत रेशमी है, यह खादी का 

यह गीत पित्त का है, यह बादी का।


भावार्थ: कवि अपने गीतों के विषयों की विविधता बताता है। वह कहता है कि वह जन्म से लेकर मृत्यु तक के गीत लिख सकता है, जीत के गीत भी और किसी की शरण में जाने के गीत भी लिख सकता है। वह गीतों की गुणवत्ता और प्रकृति को अलग-अलग प्रकारों से जोड़ता है, जैसे कि एक गीत रेशमी एहसास देता है तो दूसरा खादी की सादगी का, एक पित्त प्रकृति के व्यक्ति के लिए है तो दूसरा वात प्रकृति के लिए।


कुछ और डिजाइन भी है, ये इल्मी- 

यह लीजे चलती चीज नयी फिल्मी। 

यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत, 

यह दुकान से घर जाने का गीत,


भावार्थ: कवि कहता है कि उसके पास कुछ और "डिजाइन" यानी प्रकार के गीत भी हैं, जैसे कि ज्ञानात्मक गीत और आजकल चलन में आने वाले फिल्मी गीत। वह कुछ विशिष्ट विषयों के गीत भी बताता है, जैसे कि किसी गहरी सोच में डूबे व्यक्ति के मरने का गीत और एक साधारण व्यक्ति के दुकान से घर जाने का गीत।

**जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात ? मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात। तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत। जी, रूठ-रूठ कर मन जाते हैं गीत जी, बहुत ढेर लग गया, हटाता हूँ, गाहक की मर्जी अच्छा, जाता हूँ। मैं बिल्कुल अंतिम और दिखाता हूँ- या भीतर जाकर पूछ आइये आप। है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप, क्या करूँ, मगर लाचार हारकर

गीत बेचता हूँ। जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ।**


भावार्थ: जब ग्राहक को शायद उसकी बातों में मजाक लगता है, तो कवि कहता है कि वह तो दिन-रात लिखता ही रहता है, इसलिए स्वाभाविक रूप से तरह-तरह के गीत बन जाते हैं। वह यह भी कहता है कि उसके गीत रूठते और फिर मान भी जाते हैं (यानी उनमें भावनाओं का उतार-चढ़ाव होता है)। वह कहता है कि अब बहुत सारे गीत हो गए हैं और ग्राहक की इच्छा का सम्मान करते हुए वह जा रहा है। वह एक आखिरी गीत दिखाता है या ग्राहक को अंदर जाकर और देखने के लिए कहता है। अंत में कवि अपनी गहरी विवशता व्यक्त करता है। वह कहता है कि वैसे तो गीत बेचना पाप जैसा है, लेकिन वह मजबूर और हारा हुआ है, इसलिए उसे यह काम करना पड़ रहा है। वह फिर अपनी पहचान दोहराता है कि वह गीत बेचता है।

गीत फरोश - प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1: कवि स्वयं को क्या कहता है और क्यों?

उत्तर: कवि स्वयं को "गीत फरोश" कहता है। वह ऐसा इसलिए कहता है क्योंकि वह अपनी कविताओं (गीतों) को बेचकर अपना जीवन यापन कर रहा है। समाज में व्याप्त व्यावसायिकता और अपनी आर्थिक विवशता के कारण उसे अपनी कला को बेचना पड़ रहा है।


प्रश्न 2: कवि अपने गीतों की क्या-क्या विशेषताएँ बताता है?

उत्तर: कवि अपने गीतों की अनेक विशेषताएँ बताता है, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

कुछ गीत मस्ती में लिखे गए हैं तो कुछ पस्ती में।

एक गीत सिरदर्द भुला सकता है, तो दूसरा प्रिय को पास बुला सकता है।

कुछ गीत सुबह के लिए उपयुक्त हैं, तो कुछ अद्भुत और आजमाए हुए हैं।

कुछ गीत सुनसान जगह या पुणे में लिखे गए हैं।

एक गीत पहाड़ों पर चढ़ने की शक्ति देता है और बार-बार सुनने पर बढ़ता है।

एक गीत भूख और प्यास भगा सकता है, और श्मशान में भूत जगा सकता है।

एक गीत भुवाली की हवा जैसा है, तो दूसरा तपेदिक की दवा जैसा।

वह सीधे-सादे और अटपटे गीत भी बेचता है।

उसके पास छंद और बेछंद, अमर और तुरंत मरने वाले सभी प्रकार के गीत हैं।

वह जन्म, मरण, जीत और शरण के गीत लिख सकता है।

उसके पास रेशमी, खादी, पित्त और वादी प्रकृति के गीत भी हैं।

वह इल्मी और फिल्मी गीत भी बेचता है।

उसके पास सोच-सोच कर मर जाने और दुकान से घर जाने जैसे सामान्य विषयों के गीत भी हैं।


प्रश्न 3: कवि को पहले गीत बेचने में शर्म क्यों आती थी और बाद में उसकी सोच कैसे बदली?

उत्तर: कवि को पहले गीत बेचने में शर्म इसलिए आती थी क्योंकि कला को बेचना एक प्रकार का अनादर माना जाता है। कवि अपनी भावनाओं और विचारों को गीतों के माध्यम से व्यक्त करता है, और उन्हें एक वस्तु की तरह बेचना उसे उचित नहीं लगता था।

बाद में उसकी सोच इसलिए बदली क्योंकि उसने समाज में लोगों को अपना ईमान तक बेचते हुए देखा। जब लोग अपने नैतिक मूल्यों को बेच सकते हैं, तो कवि को लगा कि अपनी कला (गीतों) को बेचकर जीवन यापन करने में कोई बुराई नहीं है। उसने इसे सोच-समझकर अपनाया और अपनी विवशता को स्वीकार किया।


प्रश्न 4: कविता में कवि ने "कवि-धंधा" को दोहरा क्यों कहा है?

उत्तर: कविता में कवि ने "कवि-धंधा" को दोहरा इसलिए कहा है क्योंकि आजकल एक कवि को दो काम करने पड़ते हैं: पहला, कविता लिखना और दूसरा, उसे बेचना। पहले कवि केवल रचना करते थे और उन्हें राजाश्रय या समाज से सम्मान मिलता था, जिससे उनका जीवन निर्वाह होता था। लेकिन अब कवि को अपनी रचनाओं को स्वयं बेचने के लिए भी प्रयास करना पड़ता है, इसलिए उसका काम दोहरा हो गया है - कुछ घंटे लिखने में और कुछ घंटे उन्हें बेचने में बीतते हैं।

प्रश्न 5: कविता के अंत में कवि अपनी किस विवशता को व्यक्त करता है?

उत्तर: कविता के अंत में कवि इस विवशता को व्यक्त करता है कि वैसे तो गीत बेचना उसे पाप जैसा लगता है, क्योंकि कला का मूल्य अमूल्य होता है और उसे बेचा नहीं जाना चाहिए। लेकिन वह लाचार और हारा हुआ है, शायद आर्थिक तंगी और समाज की व्यावसायिक मानसिकता के आगे मजबूर होकर उसे यह कर्म करना पड़ रहा है। इसलिए वह अनिच्छा से ही गीत बेचता है।

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