कविता: मधुबयार
जाने किस जीवन की सुधि ले
लहराती आती मधु-बयार !
रंजित कर दे यह शिथिल चरण ले नव अशोक का अरुण राग,
मेरे मण्डल को आज मधुर ला रजनीगन्धा का पराग,
यूथी की मीलित कलियों से
अलि, दे मेरी कबरी संवार !
पाटल के सुरभित रंगों से रंग दे हिम-सा उज्ज्वल दुकूल, गुँथ दे रशना में अलि-गुंजन से पूरित झरते वकुल-फूल,
रजनी से अंजन माँग सजनि,
दे मेरे अलसित नयन सार !
तारक-लोचन से सींच-सींच नभ करता रज को विरज आज,
बरसाता पथ में हरसिंगार, केशर से चर्चित सुमन-लाज,
कण्टकित रसालों पर उठता-
है पागल पिक मुझ को पुकार !
लहराती आती मधु-बयार ! (“ सांध्यगीत से”)
कठिन शब्दों के अर्थ:
मधु-बयार: मीठी हवा, वसंत ऋतु की सुगंधित हवा।
सुधि: याद, स्मरण।
रंजित: रंगना, रंगीन करना।
शिथिल: थके हुए, सुस्त।
अरुण राग: लाल रंग, प्रातःकालीन लालिमा। यहाँ, नए अशोक के पत्तों का लाल रंग।
मण्डल: समूह, घेरा। यहाँ, शरीर या परिवेश।
मधुर: मीठा, सुहावना।
रजनीगन्धा: एक सुगंधित सफेद फूल (ट्यूबरोज़)।
पराग: फूल का वह चूर्ण जिसमें नर भाग होता है और जो मादा भाग को निषेचित करता है, फूलों का धूल।
यूथी: जूही का फूल।
मीलित: बंद, मुंदी हुई।
कबरी: बालों का जूड़ा।
अलि: भौंरा, भ्रमर। यहाँ, सखी या प्रिय के लिए संबोधन।
संवार: सजाना, ठीक करना।
पाटल: गुलाब का फूल।
सुरभित: सुगंधित, खुशबूदार।
दुकूल: वस्त्र, कपड़ा।
रशना: कमर में पहनने की करधनी या मेखला।
अलि-गुंजन: भौंरों की गुंजार।
पूरित: भरा हुआ।
वकुल-फूल: मौलसिरी का फूल।
रजनी: रात।
अंजन: काजल।
सजनि: सखी, प्रियतमा।
अलसित: आलसी, सुस्त।
नयन सार: आँखों का सौंदर्य, आँखों की चमक।
तारक-लोचन: तारों रूपी आँखें। यहाँ, आकाश के तारे।
विरज: धूल रहित, स्वच्छ।
हरसिंगार: एक सुगंधित फूल का पौधा (पारिजात)।
चर्चित: सजाया हुआ, लेपित।
सुमन-लाज: फूलों की शोभा या सुंदरता।
कण्टकित: काँटों से भरा हुआ।
रसाल: आम का पेड़।
पिक: कोयल।
भावार्थ (पंक्तियों सहित):
जाने किस जीवन की सुधि ले लहराती आती मधु-बयार !
भावार्थ: यह मीठी हवा, जो धीरे-धीरे लहराती हुई आ रही है, न जाने किस पिछले जीवन की याद लेकर आ रही है। अर्थात, यह हवा किसी पुरानी, सुखद स्मृति को ताजा कर रही है।
रंजित कर दे यह शिथिल चरण ले नव अशोक का अरुण राग,
मेरे मण्डल को आज मधुर ला रजनीगन्धा का पराग,
भावार्थ: हे मीठी हवा! मेरे थके हुए पैरों को नए अशोक के पत्तों के लाल रंग से रंग दे, अर्थात उनमें नई ऊर्जा का संचार कर दे। और आज मेरे चारों ओर रजनीगंधा के फूलों की मधुर सुगंध और पराग कणों को भर दे, जिससे मेरा परिवेश सुगन्धित हो उठे।
यूथी की मीलित कलियों से अलि, दे मेरी कबरी संवार !
भावार्थ: हे सखी (या प्रिय)! जूही की बंद कलियों से मेरे बालों के जूड़े को सजा दे, अर्थात मेरे केशों को जूही की कलियों से अलंकृत कर दे।
पाटल के सुरभित रंगों से रंग दे हिम-सा उज्ज्वल दुकूल, गुँथ दे रशना में अलि-गुंजन से पूरित झरते वकुल-फूल,
भावार्थ: गुलाब के सुगंधित रंगों से मेरे बर्फ के समान उज्ज्वल वस्त्र को रंग दे। और मेरी कमर में भौंरों की गुंजार से भरे हुए, झरते हुए मौलसिरी के फूलों को गूँथ दे, जिससे मेरी कटि सौंदर्य से भर जाए।
रजनी से अंजन माँग सजनि, दे मेरे अलसित नयन सार !
भावार्थ: हे सखी! रात से काजल माँगकर मेरी आलसी आँखों को चमक और सुंदरता प्रदान कर दे, अर्थात मेरी आँखों को काजल से सजाकर और अधिक आकर्षक बना दे।
तारक-लोचन से सींच-सींच नभ करता रज को विरज आज, बरसाता पथ में हरसिंगार, केशर से चर्चित सुमन-लाज,
भावार्थ: तारों रूपी आँखों से सींच-सींचकर आकाश आज धूल को दूर कर रहा है, अर्थात आकाश स्वच्छ और निर्मल हो गया है। और मेरे रास्ते में हरसिंगार के फूल बरसा रहा है, तथा केसर से सजे हुए सुंदर फूल अपनी लाज बिखेर रहे हैं।
कण्टकित रसालों पर उठता- है पागल पिक मुझ को पुकार ! लहराती आती मधु-बयार !
भावार्थ: काँटों से भरे हुए आम के पेड़ों पर एक मतवाली कोयल मुझे पुकार रही है। यह मीठी हवा फिर से लहराती हुई आ रही है, जो प्रकृति में सौंदर्य, प्रेम और नवीनता का संदेश लेकर आ रही है।
यह कविता वसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति में होने वाले सुंदर परिवर्तनों का मनोहारी वर्णन करती है। कवयित्री प्रकृति के विभिन्न उपादानों से अपने सौंदर्य को सजाने और अपने मन को प्रसन्न करने की कामना करती हैं। यह कविता प्रकृति और मानवीय भावनाओं के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करती है।
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