Saturday, April 12, 2025

प्रश्न - हिंदी साहित्य में प्रगतिवाद से क्या तात्पर्य है। इसकी विशेषताएं संक्षेप में लिखिए।

  प्रश्न - हिंदी साहित्य में प्रगतिवाद से क्या तात्पर्य है। इसकी विशेषताएं संक्षेप में लिखिए।

उत्तर -

हिंदी साहित्य में प्रगतिवाद उस साहित्यिक आंदोलन को कहते हैं जो मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित था। इसका उदय 1930 के दशक में हुआ और यह 1940 के दशक तक हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा। प्रगतिवाद का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त शोषण, अन्याय और असमानता के विरुद्ध आवाज उठाना था और शोषित वर्ग (जैसे किसान, मजदूर, दलित) के प्रति सहानुभूति व्यक्त करना था।

संक्षेप में इसकी विशेषताएं इस प्रकार हैं:

१) सामाजिक यथार्थवाद: प्रगतिवादी साहित्य में समाज के वास्तविक और कटु यथार्थ का चित्रण किया जाता है। इसमें गरीबी, बेरोजगारी, भूख, बीमारी और वर्ग संघर्ष जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया जाता है।

२) शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति: इस साहित्य में किसान, मजदूर और अन्य दबे-कुचले वर्गों के प्रति गहरी सहानुभूति और उनके संघर्षों के प्रति समर्थन व्यक्त किया जाता है।

३) शोषक वर्ग का विरोध: प्रगतिवादी रचनाएं पूंजीपतियों, जमींदारों और अन्य शोषक वर्गों की आलोचना करती हैं और उनकी शोषणकारी नीतियों का विरोध करती हैं।

४) क्रांति की भावना: प्रगतिवादी साहित्य में सामाजिक परिवर्तन और क्रांति की प्रबल भावना दिखाई देती है। यह मौजूदा अन्यायपूर्ण व्यवस्था को बदलने का आह्वान करता है।

५) धर्म और रूढ़ियों का विरोध: प्रगतिवादी लेखक धर्म, भाग्य, अंधविश्वास और पुरानी रूढ़ियों का विरोध करते हैं, क्योंकि उन्हें यह शोषित वर्ग के शोषण को बनाए रखने वाले कारक लगते हैं।

६) वैज्ञानिक दृष्टिकोण: इस साहित्य में वैज्ञानिक और तर्कसंगत दृष्टिकोण को महत्व दिया जाता है।

७) जनभाषा का प्रयोग: प्रगतिवादी कवियों और लेखकों ने आम जनता की भाषा (खड़ी बोली) का प्रयोग किया ताकि उनकी रचनाएं अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सकें।

८) कला कला के लिए नहीं: प्रगतिवादी साहित्यकारों का मानना था कि कला का उद्देश्य समाज सेवा और सामाजिक परिवर्तन होना चाहिए, न कि केवल सौंदर्य की सृष्टि करना।

निष्कर्ष :- प्रगतिवाद हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ था जिसने साहित्य को समाज के आम आदमी के करीब लाने और सामाजिक चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके प्रमुख कवियों में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगल सिंह 'सुमन', त्रिलोचन और रांगेय राघव आदि शामिल हैं।

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