Friday, February 14, 2025

दुनिया में कुछ कर दिखाओ” का सरल भावार्थ

 संत तुकडोजी महाराज की कविता “लहर की बरखा” के “दुनिया में कुछ कर दिखाओ” का सरल भावार्थ



संत तुकडोजी महाराज की ये पंक्तियाँ हमें जीवन की सच्चाई, कर्म, अहंकार, भक्ति, और मोक्ष का महत्व समझाती हैं। उनका संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—जीवन में विनम्रता, परिश्रम, और सच्ची आस्था ही व्यक्ति को महान बनाती है। अब हम प्रत्येक पंक्ति का सरल शब्दों में विस्तार से भावार्थ समझते हैं।




पंक्ति ३४

"अपनी ही तारीफ तू करेगा, तब समझना मौत है।

जब नम्रता की बात हो, सामर्थ्य तब अद्भुत है।।

सच्चे करम की राह में, अपनी लगन हरदम रहे।

सत्ता मिले, या ना मिले, भगवान का ही दम रहे।।"


भावार्थ:

जब कोई व्यक्ति अपनी ही तारीफ करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि उसमें अहंकार आ गया है, और अहंकार व्यक्ति को बर्बाद कर देता है। सच्ची शक्ति नम्रता में होती है। यदि हम अच्छे कर्म करें और अपनी मेहनत में लगे रहें, तो सत्ता मिले या न मिले, लेकिन ईश्वर की कृपा हमेशा बनी रहती है। इसलिए हमें अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए, न कि पद और प्रतिष्ठा पर।




पंक्ति ३५

"है पेट छोटा भी तभी, कितना अभी तक खा गया।

है पैर छोटे भी तभी, कितने ही कोसों चल गया।।

यह आँख कितनी छोटी है, फिर भी दिखा अस्मान है।

है यार! छोटी जान ने, कर दी जगत में तान है।।"


भावार्थ:

मनुष्य का शरीर भले ही छोटा है, लेकिन इसकी क्षमताएँ अपार हैं। हमारा मुँह छोटा होते हुए भी अनगिनत भोजन ग्रहण कर सकता है, हमारे पैर छोटे होते हुए भी लंबी यात्राएँ तय कर सकते हैं, और हमारी आँखें छोटी होते हुए भी अनंत आकाश को देख सकती हैं। इसी तरह, मनुष्य की आत्मा भी शक्तिशाली होती है। यदि वह ठान ले, तो संसार में महान कार्य कर सकता है।




पंक्ति ३६

"जाना न, ठहरो इस जगह, सबको ही आना है यहाँ।

सत्ता रहे, या जिंदगी? तन भी न रहना है यहाँ।।

जो कुछ भी करना हो उसे, अपने तपोबल कर चलो।

नहीं तो जगह खाली करो, फिर जी चलो, या मर चलो।।"


भावार्थ:

यह संसार नश्वर है। कोई भी व्यक्ति यहाँ स्थायी रूप से नहीं रह सकता। सत्ता हो या जीवन, सब कुछ क्षणिक है। जब शरीर भी नष्ट हो जाएगा, तो इन सांसारिक चीजों का कोई अर्थ नहीं रहेगा। इसलिए, जब तक हम जीवित हैं, तब तक हमें अपने पुरुषार्थ और मेहनत से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।




पंक्ति ३७

"अब होयगा, फिर होयगा, वह कौन सुनता है भला?

जो होयगा अब ही करो, करने की गर होगी कला।।

मुरदा बनोगे आलसी होकर, यहाँ तब तुम नहीं।

करके दिखावेगा कोई, बस जिंदगी उसकी रही।।"


भावार्थ:

काम को टालना मूर्खता है। "अब करेंगे, फिर करेंगे" कहने से कुछ नहीं होगा। जो करना है, उसे अभी करना चाहिए। यदि कोई आलसी बनकर बैठेगा, तो वह दुनिया में किसी काम का नहीं रहेगा। लेकिन जो व्यक्ति अपने कर्मों से कुछ करके दिखाएगा, वही इस दुनिया में याद रखा जाएगा।




पंक्ति ३८

"'दुनिया मेरी' मत बोल, यह तो हो नहीं किसकी गई।

लाखों गए, लाखों चले, पर यह यहीं कायम रही।।

तू शान करके आप अपने को खत्म करने गया।

जिसने किया कुछ नाम वह ही, इस जगत में रह गया।।"


भावार्थ:

दुनिया किसी की नहीं है। अनगिनत लोग इस संसार में आए और चले गए, लेकिन यह दुनिया वैसे की वैसी ही बनी रही। यदि कोई व्यक्ति अपने अहंकार में जीता है, तो वह खुद को ही नष्ट कर देता है। लेकिन जिसने अच्छे कर्म किए, वही अमर हो जाता है और उसकी पहचान बनी रहती है।




पंक्ति ३९

"तू आँख अपनी खोलकर, तो देख सच्चा क्या यहाँ?

जितना तुझे अपना लगे, वह सब दिखेगा जल गया।।

कुछ खा गया, कुछ पी गया, कुछ भोग में है बह गया।

उपकार गर कुछ कर गया, तेरा वही बस रह गया।।"


भावार्थ:

इस संसार में जो कुछ भी हमें अपना लगता है, वह सब नष्ट हो जाता है। हमारा खाया-पिया, हमारा भोग-विलास, सब कुछ एक दिन खत्म हो जाएगा। लेकिन यदि हमने किसी के लिए अच्छा किया है, कोई पुण्य कर्म किए हैं, तो वही हमारे जाने के बाद भी बना रहेगा।



पंक्ति ४०

"क्यों मुक्ति को सख्ती करो? वह तो सहज ही पास है।

सख्ती ही करनी है अगर, मत हो विषय के दास है।।

सारी उपाधी छोड़ दो, और लीन हो प्रभु नाम में।

लवलीन हो उसमें सदा, तब मुक्ति आवे काम में।।"


भावार्थ:

मोक्ष या मुक्ति प्राप्त करना कठिन नहीं है, यह तो बहुत सरल है। यदि कोई कठोर साधना करनी ही है, तो अपनी इंद्रियों और इच्छाओं को नियंत्रित करने में करें। यदि हम सांसारिक बंधनों को छोड़कर भगवान के नाम में लीन हो जाते हैं, तो हमें स्वतः ही मुक्ति प्राप्त हो जाएगी।




पंक्ति ४१

"ख्रिश्चन ये गिर्जाघर बढ़े, इस्लाम मसजिद में पढ़े।

'गच्छामि शरणं' बुद्ध सब, त्रैवार जय करके खड़े।।

ऐ हिन्दू! तूने क्यों गंवाई, मंदिरों की प्रार्थना?

क्यों भ्रष्ट ऐसा हो गया, सब भूलकर आराधना?"


भावार्थ:

अन्य धर्मों के लोग अपनी आस्था में अडिग हैं। ईसाई चर्चों में प्रार्थना करते हैं, मुसलमान मस्जिदों में नमाज पढ़ते हैं, और बौद्ध धर्म के अनुयायी अपनी शिक्षाओं का पालन करते हैं। लेकिन हिंदू अपने ही धर्म और पूजा-पाठ को भूलते जा रहे हैं। यह प्रश्न उठता है कि आखिर हिंदू अपनी संस्कृति और धार्मिक आस्थाओं से विमुख क्यों हो गया?




पंक्ति ४२


"मीठा है मख्खन भी सही, और दूध भी, शक्कर भी है।

फल भी तो मीठे हैं बड़े, खाने को सब तत्पर भी हैं।

पर जान ही नहीं जान में, फिर तो मीठा कुछ भी नहीं।

मुर्दा जलाओ अग्नि में, सबको मीठी आखिर वहीं।।"


भावार्थ:

जीवन में सुख-सुविधाओं का आनंद तब तक है, जब तक आत्मा जीवित है। मक्खन, दूध, फल, शक्कर सब मीठे होते हैं, लेकिन जब शरीर मर जाता है, तो इनका कोई महत्व नहीं रह जाता। अंत में सब कुछ अग्नि में जल जाता है।




पंक्ति ४३

"मरना ही है मुझको तो क्या, मैं जहर खाए मर चलूं?

यह जिंदगी झूठी है तो, फिर आग इसमें धर चलूं।।

सब छोड़ना ही है अगर, तब पाप करके छोड़ दूं?

बिलकुल ही मुझसे न बने, जो राह बुरी जोड़ दूं।।"


भावार्थ:

यदि मृत्यु निश्चित है, तो इसका यह मतलब नहीं कि हम जीवन का दुरुपयोग करें। यदि जीवन नश्वर है, तो इसमें गलत काम क्यों करें? जब छोड़ना ही है, तो क्यों न अच्छे कर्म करके छोड़ा जाए? जीवन को सही राह पर चलाना ही बुद्धिमानी है।



निष्कर्ष:

संत तुकडोजी महाराज हमें सिखाते

 हैं कि हमें अहंकार से बचना चाहिए, कर्मशील बनना चाहिए, सत्य को पहचानना चाहिए और जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।









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