Saturday, February 15, 2025

छात्रों का आन्दोलन क्यों? (भावार्थ सहित)

 छात्रों का आन्दोलन क्यों? (भावार्थ सहित)

(संत तुकडोजी महाराज द्वारा रचित पंक्तियाँ एवं उनका भावार्थ)


४४

मंदीर पर ताबा करो, गौएँ कटाओ धाम में ।

साधू को डालो जेल में, मदिरा को लाओ काम में ।।

गुंडे बढाओ, मान क्या, सत्ता भी उनको बांट दो ।

घर-घर कलह भी हो भले, फिर भी हमें ही 'वोट' दो ।।


भावार्थ:

कवि समाज में बढ़ते अनैतिक आचरण और राजनीतिक भ्रष्टाचार की आलोचना कर रहे हैं। धर्म और संस्कृति का अपमान किया जा रहा है, जबकि अधर्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। सत्ता पाने के लिए गुंडों और अपराधियों को आगे बढ़ाया जा रहा है, जिससे समाज में अशांति फैल रही है। फिर भी नेता केवल वोट पाने के लिए जनता को भ्रमित कर रहे हैं।


४५

क्या राज ऐसा ही चलेगा, भीख पर परदेश के ? ।

क्यों छात्र नहीं होवेंगे तंग, अभिमानि जो इस देश के ? 

ऐ राज्यकर्ताओं ! तुम्हारी, नीति को सुधरो अभी ।

नहिं तो बडी क्रांती ही होगी, क्या सुधारोगे तभी ? ।।


भावार्थ:

कवि सरकार की विदेश-निर्भर नीतियों पर कटाक्ष कर रहे हैं। वे पूछते हैं कि क्या देश हमेशा विदेशी सहायता पर निर्भर रहेगा? जब देश के छात्र देखेंगे कि उनका देश आत्मनिर्भर नहीं है, तो वे निश्चित रूप से आक्रोशित होंगे। कवि शासकों को चेतावनी देते हैं कि यदि वे अपनी नीतियाँ नहीं सुधारते, तो एक बड़ा आंदोलन खड़ा होगा।


४६

कितना किया कर्जा है तुमने, छात्र क्या नहिं जानते ? ।

भोगा न जाये दुःख फिर, जो जानते, पहिचानते ।।

सब देश बेचो, फिर भी कर्जा, हो नहीं सकता अदा ।

यहि सोचकर उन छात्र का, दिल टूटता है सर्वदा ।।


भावार्थ:

सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण देश कर्ज़ में डूब गया है, और छात्र इस सच्चाई से अनजान नहीं हैं। वे जानते हैं कि देश की संपत्ति बेचने के बावजूद भी यह कर्ज़ चुकाया नहीं जा सकता। यह विचार उन्हें निराश और क्रोधित करता है।


४७

जिनको चलाना देश आखिर, किम भरोसे पर चले ? ।

लुचपत शराबी बढ गयी, क्यों ये न हाथों को मलें ? ।।

नहिं धर्म-नीती भी सिखायी, हाथ खाली कर दिये ।

तुम देशभक्तों के तो दिन, अब हो गये तुम चल दिये ।।


भावार्थ:

देश के भविष्य को संवारने वाले युवा दिशाहीन होते जा रहे हैं। वे शराब और गलत आदतों की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि उन्हें नैतिकता और धर्म का सही मार्ग दिखाया जाना चाहिए था। इस स्थिति को देखकर सच्चे देशभक्त निराश हो रहे हैं।


४८

पर एक भूल है छात्र की, वह तोल अपना छोडते ।

राष्ट्रीय अपना माल भी, सारे मिलाकर तोडते ।।

नुकसान होता है उन्हींका, ख्याल उनको है नहीं ।

लडना मुझे है मान्य, पर नुकसान ना होवे कहीं ।।


भावार्थ:

छात्र अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन कभी-कभी वे अति कर जाते हैं और देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं। कवि उन्हें चेताते हैं कि उनका आंदोलन उचित हो, लेकिन उसमें राष्ट्र का अहित न हो।


४९

हम संघटन करके पुरा, पूछेंगे शासक को यहीं।

तुमको धरम औ संस्कृती की, तो न पर्वा है कही ।।

हम भारती है गर सभी, कानून तब क्यों भिन्न हो ? ।

हिंदू रहे, इस्लाम हो, ख्रिश्चन रहे या जैन हो ।।


भावार्थ:

छात्र संगठित होकर सरकार से प्रश्न करेंगे कि उन्हें धर्म और संस्कृति की कोई चिंता क्यों नहीं है। यदि सभी भारतीय समान हैं, तो धर्म के आधार पर भेदभाव क्यों हो रहा है? कानून सबके लिए समान होना चाहिए।


५०

जो आज के है छात्र वेही, देश के आधार है।

उनको बताओ आज तक का, क्या रहा व्यापार है ।।

परदेशियों को साथ लेकर, घर सभी बतलाओगे ।

तब क्या तुम्हारी शक्ति है, जो देश धर्म बचाओगे ? ।।


भावार्थ:

छात्र देश का भविष्य हैं, इसलिए उन्हें वास्तविकता से परिचित कराना आवश्यक है। यदि शासक विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर देश चला रहे हैं, तो वे भविष्य में देश और धर्म की रक्षा कैसे करेंगे?


५१

अनजान नहिं हैं छात्र सारे, राजकारण जानने ।

सब कुछ तुम्हारा आज का, 'कर्ता किया' पहिचानने ।।

है बुद्धि उनकी तीव्र, उनको लग रही यह चोट है।

समझाओ नेताओं ! सभी, नहिं तो मिले नहिं 'वोट' है ।।


भावार्थ:

आज के छात्र राजनीति को समझने लगे हैं और वे सरकार की गलत नीतियों को पहचान रहे हैं। यदि नेताओं ने अपनी नीतियाँ नहीं बदलीं, तो वे जनता का समर्थन खो देंगे।


५२

छात्रों ! जरा तो सोच लो, परदेश के मत दास हो ।

जो कुछ करो 'भारत हमारा', मानकर उन्नत करो ।।

सब विश्व के भी 'वाद" का भारत ही मूलाधार है।

पढ़ लो जरा अध्यात्म तो, होंगे नहीं बेजार है ।।


भावार्थ:

छात्रों को विदेशियों के प्रभाव में आने के बजाय अपने देश को उन्नति की ओर ले जाना चाहिए। भारत की संस्कृति और अध्यात्म पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं, इसलिए उन्हें इसे अपनाना चाहिए।


५३

इन जाति-पॉती, पक्ष-पंथों को, जहाँ नहिं स्थान है।

इन्सान सब ही एक हैं, औ जीव सबही समान है ।।

सबकी भलाई का हि मतलब, धर्म है, सच कर्म है।

अध्यात्म शिक्षा है वही, समझो ऐ छात्रों ! वर्म है ।।


भावार्थ:

जाति-पांति और संप्रदायों का भेदभाव गलत है। सभी मनुष्य समान हैं, और सच्चा धर्म वही है जो सबकी भलाई के लिए हो। छात्रों को इसे समझकर समाज को जोड़ने का काम करना चाहिए।


५४

हर आदमी चाहता है, अपने आत्म का सन्मान हो ।

वैसा हि उसको ज्ञान दो, जिससे न वह हैरान हो ।।

जब तुम दबाते हो किसे, तब तुम भी दबते हो कहीं।

यह याद रखना चाहिए, हमसे दबे कोई नहीं ।।


भावार्थ:

हर व्यक्ति अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना चाहता है। उसे ऐसा ज्ञान दिया जाना चाहिए जिससे वह आत्मनिर्भर बने और किसी से भयभीत न हो। जब एक व्यक्ति दूसरों को दबाता है, तो वह स्वयं भी कहीं न कहीं दबता है।




५५

ये छात्र भटकाये गये, यह आज ही दिखता तुम्हें ।

मैं तो जनम से देखता, यहि समझ मिलती है उन्हें ।।

सबसे बडे दोषी हो तुम, उनका न तुमको ख्याल था ।

शिक्षा न उनको धर्म की दी, तो दुजा क्या हाल था? ।।


भावार्थ:

कवि कह रहे हैं कि आज के छात्र भटक गए हैं, लेकिन यह समस्या आज की नहीं है, बल्कि यह लंबे समय से चल रही है। जिन लोगों के कंधों पर शिक्षा देने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने छात्रों की सही मार्गदर्शन नहीं किया। धर्म और नैतिकता की शिक्षा न देने का परिणाम यह हुआ कि छात्र दिशाहीन हो गए हैं।


५६

माँ-बाप को 'स्त्री-पुरुष' कहना, शिक्षकों को 'दोस्त' है ।

ऐसी ही जिनकी संस्कृती, विषयों में ही सब मस्त है ।।

वे क्या करेंगे धर्म का ? उनको नहीं शिक्षा मिली ।

बंदर में, उनमें भेद क्या ? जैसी चली, वैसी चली ।।


भावार्थ:

कवि समाज में हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तन की आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि यदि बच्चे अपने माता-पिता को सिर्फ ‘स्त्री-पुरुष’ मानते हैं और शिक्षकों को केवल ‘दोस्त’ समझते हैं, तो यह शिक्षा का पतन है। जब समाज केवल विषयों की पढ़ाई में ही व्यस्त हो जाता है और नैतिकता और धर्म की शिक्षा नहीं देता, तो उसमें और जानवरों में कोई अंतर नहीं रह जाता।


५७

मैंने कहा है, धर्म के माने, यथोचित कर्म है।

जो चाहिए 'जीयें सभी मिलके' यही सत्कर्म है ।।

अपने स्वभावों से उन्हें, बतला दिया, लिखवा दिया ।

करके मचा झगडा यहाँ, सब स्वार्थ हा अब रह गया ।।


भावार्थ:

कवि कहते हैं कि धर्म का वास्तविक अर्थ है – उचित कर्म करना। सच्चा धर्म वही है जिससे सभी मिलकर शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें। लेकिन आज के समाज में धर्म का वास्तविक अर्थ भुला दिया गया है। अब धर्म के नाम पर केवल स्वार्थ रह गया है, और लोग आपसी झगड़ों में उलझे हुए हैं।


निष्कर्ष:

संत तुकडोजी महाराज की इन पंक्तियों में छात्रों की भटकाव की समस्या, शिक्षा व्यवस्था की खामियाँ, सांस्कृतिक गिरावट, और धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने की आवश्यकता 

पर जोर दिया गया है। वे कहते हैं कि यदि छात्रों को सही दिशा में नहीं लाया गया, तो समाज और देश दोनों का भविष्य संकट में पड़ जाएगा।





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