दुलाईवाली पाठ का सारांश
राजेन्द्रबाला घोष
कहानी की शुरुआत बनारस के पवित्र शहर में होती है, जहाँ वंशीधर अपनी पत्नी जानकी देवी को उनके मायके से विदा कराकर अपने घर इलाहाबाद ले जाने के लिए आए हैं। आषाढ़-सावन के मौसम की तरह जानकी की आँखों से आँसू बह रहे हैं, अपनी प्रियजनों को छोड़ने का दुख उन्हें व्याकुल कर रहा है। वंशीधर, दशाश्वमेध घाट पर स्नान करके, अपनी भीगी धोती और कुछ निजी सामान लेकर गोदौलिया की संकरी गलियों से होते हुए ससुराल पहुँचते हैं।
उन्हें नवलकिशोर का तार मिला है, जो उनके दूर के रिश्तेदार होने के साथ-साथ घनिष्ठ मित्र भी हैं। नवलकिशोर अपनी नई पत्नी के साथ कलकत्ते से आ रहे हैं और उन्होंने वंशीधर और जानकी को मुगलसराय से साथ में इलाहाबाद चलने के लिए कहा है। वंशीधर को जल्दी में निकलना पड़ता है, जिससे जानकी थोड़ी नाराज़ भी होती हैं क्योंकि उन्हें अचानक यात्रा की तैयारी करने में असुविधा हो रही है।
ससुराल में माहौल गमगीन है। जानकी की माँ अपनी रोती हुई बेटी के लिए विदाई का सामान इकट्ठा कर रही हैं, जबकि जानकी खुद भी आँसुओं के बीच तैयार हो रही हैं, अपनी माँ को ज़रूरी चीजें याद दिलाती जा रही हैं। उनके साले सालेराम की तबीयत ठीक नहीं है और घर में नौकर-चाकरों की कमी है, जिससे स्टेशन तक सवारी का इंतजाम करना मुश्किल हो रहा है। वंशीधर पहले पालकी भाड़े पर लेने की सोचते हैं, लेकिन उसका खर्च ज़्यादा लगता है, इसलिए वे अंततः एक इक्का (तांगा) ले आते हैं, जो सभ्य महिलाओं के लिए बहुत आरामदायक सवारी नहीं मानी जाती।
जानकी भारी मन से इक्के पर बैठती हैं और जैसे-जैसे वे सिकरोल स्टेशन की ओर बढ़ते हैं, उनका रोना धीरे-धीरे शांत होने लगता है। रास्ते में वंशीधर को अपनी वेशभूषा का ध्यान आता है – वे गलती से अपनी विलायती धोती पहन आए हैं, जबकि उनके मित्र नवलकिशोर अब कट्टर स्वदेशी विचारधारा के समर्थक बन गए हैं और उन्हें विदेशी वस्तुओं से सख्त नफरत है। वंशीधर चिंतित होते हैं कि नवलकिशोर उन्हें ज़रूर ताना मारेंगे।
स्टेशन पर पहुँचने पर कुली उन्हें घेर लेते हैं। इक्केवाला वंशीधर को पुल के उस पार से ड्योढ़े दर्जे का टिकट खरीदने की सलाह देता है, जहाँ शायद भीड़ कम हो। मुगलसराय पहुँचकर वंशीधर उत्सुकता से नवलकिशोर का इंतजार करते हैं, लेकिन गाड़ी आने पर उन्हें उनका कोई अता-पता नहीं चलता। वंशीधर निराश और क्रोधित होते हैं, सोचते हैं कि नवलकिशोर ने उन्हें मूर्ख बनाया है।
बिना किसी और विकल्प के, वंशीधर जानकी को जनानी गाड़ी (महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बा) में बैठाते हैं और खुद बगल के तीसरे दर्जे के डिब्बे में बैठते हैं, क्योंकि ड्योढ़े दर्जे का कमरा कलकत्ते से आने वाले यात्रियों से खचाखच भरा होता है। उनके डिब्बे में कुछ ग्रामीण महिलाएँ बैठी हैं और एक रहस्यमयी स्त्री भी है, जिसने फ्रांसीसी छींट की दुलाई (रजाई) ओढ़ी हुई है और जिसका चेहरा घूंघट से ढका है। वह अकेली और गुमसुम बैठी है।
ग्रामीण महिलाएँ उस घूंघट वाली स्त्री के बारे में तरह-तरह की अटकलें लगाती हैं, उसे डराती हैं और उसके अकेले होने पर चिंता व्यक्त करती हैं। वंशीधर को उस पर दया आती है और वे उन महिलाओं को शांत करते हैं और उस रहस्यमयी महिला की मदद करने की पेशकश करते हैं। वे सोचते हैं कि शायद उसके पति या कोई संबंधी अगली गाड़ी से आने वाला होगा।
जब गाड़ी इलाहाबाद के करीब पहुँचती है, तो वंशीधर उस अकेली स्त्री के भविष्य के बारे में चिंतित हो उठते हैं। इलाहाबाद स्टेशन पर उतरने के बाद, वे जानकी को एक बुढ़िया के साथ बैठाकर उस घूंघट वाली महिला को ढूंढने जाते हैं, लेकिन वह कहीं नहीं मिलती। तभी, वे देखते हैं कि वही दुलाई ओढ़े हुए आकृति उनकी ओर आ रही है।
जैसे ही वह पास आती है, वह अपना घूंघट हटाती है, और वंशीधर आश्चर्यचकित रह जाते हैं – वह नवलकिशोर हैं! नवलकिशोर ने वंशीधर के साथ एक विस्तृत मज़ाक की योजना बनाई थी। वे मुगलसराय से ही वंशीधर की गाड़ी में छिपकर बैठ गए थे और एक अकेली महिला का वेश धारण कर लिया था। मिरजापुर में जब वंशीधर पेट पूजा में व्यस्त थे, तो नवलकिशोर चुपचाप उनके डिब्बे में आ बैठे थे, यह सोचकर कि वंशीधर के आने पर अपना रहस्य खोलेंगे।
वंशीधर को पहले तो गुस्सा आता है, लेकिन फिर उन्हें हंसी आ जाती है। वे नवलकिशोर को उनकी शरारत के लिए थोड़ा डांटते भी हैं। जानकी भी अपनी 'ननद' (नवलकिशोर के स्त्री रूप) की इस हरकत को सुनकर हैरान और मनोरंजित होती हैं। अंततः, दोनों मित्र अपनी-अपनी पत्नियों के साथ खुशी-खुशी अपने घर की ओर प्रस्थान करते हैं, और लेखक इस राम-कहानी को समाप्त करने की राहत महसूस करता है।
यह विस्तृत सारांश कहानी के पात्रों की भावनाओं, सामाजिक संदर्भों और नवलकिशोर की शरारत की योजना के क्रमिक विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है। यह दिखाता है कि कैसे हास्य और मानवीय सहानुभूति इस कहानी के महत्वपूर्ण तत्व हैं।
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