Monday, April 14, 2025

पंथ अपरिचित (अर्थ, भावार्थ एवं सारांश)

                 पंथ अपरिचित

                              - महादेवी वर्मा 


पंथ रहने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !

घेर ले छाया अमा बन, 

आज कज्जल अश्रुओं में रिमझिमा ले यह घिरा घन, और होंगे नयन सूखे,

तिल बुझे औ' पलक रूखे, 

आर्द्र चितवन में यहाँ शत विद्युतों में दीप खेला ! 

अन्य होंगे चरण हारे 

और हैं जो लौटते, 

दे शूल को संकल्प सारे; 

दुखव्रती निर्माण उन्मद, 

यह अमरता नापते पद, 

बाँध देंगे अंक संमृति से तिमिर में स्वर्ण बेला ।


दूसरी होगी कहानी, 

शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोयी निशानी;


आज जिस पर प्रलय विस्मित, 

मैं लगाती चल रही नित, 

मोतियों की हाट औ' चिनगारियों का एक मेला !


हास का मधु दूत भेजो 

रोष भ्रू-भंगिमा पतझार को चाहे सहे जो; 

ले मिलेगा उर अचंचल, 

वेदना-जल, स्वप्न-शतदल, 

जान लो वह मिलन एकाकी विरह में है दुकेला 

पंथ रहने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !


पंथ अपरिचित - महादेवी वर्मा

कठिन शब्दों के अर्थ:

पंथ: रास्ता, मार्ग

अपरिचित: अनजान, जिससे परिचय न हो

प्राण: जीवन, आत्मा

अकेला: अकेला, एकाकी

अमा: अमावस्या की रात का अंधकार, गहरा अंधकार

कज्जल: काजल

अश्रु: आँसू

रिमझिमा ले: धीरे-धीरे बरसना

घिरा घन: घिरा हुआ बादल

नयन: आँखें

सूखे: जिनमें नमी न हो

तिल बुझे: बुझे हुए तारे (यहाँ अर्थ है आशाहीन)

पलक: आँखों की ऊपरी और निचली चमड़ी

रूखे: सूखे, नीरस

आर्द्र: नम, गीली

चितवन: दृष्टि, देखने का भाव

शत: सौ

विद्युत: बिजली

दीप खेला: दीपक का जलना (यहाँ अर्थ है आशा का संचार होना)

चरण: पैर

हारे: थक गए

लौटते: वापस जाते हुए

शूल: काँटा, पीड़ा

संकल्प: दृढ़ निश्चय

दुखव्रती: दुख का व्रत लेने वाला, दुख को सहने वाला

निर्माण उन्मद: रचना के उत्साह में डूबा हुआ

अमरता नापते पद: ऐसे कदम जो अमरता की ओर बढ़ रहे हैं

अंक: गोद, आलिंगन

स्मृति: याद

तिमिर: अंधकार

स्वर्ण बेला: सुनहरी बेला, सुनहरा समय (यहाँ अर्थ है आशा का क्षण)

शून्य: खालीपन

ध्वनि: आवाज

धूलि: मिट्टी

निशानी: चिह्न, पहचान

प्रलय: विनाश, तबाही

विस्मित: आश्चर्यचकित

नित: हमेशा

मोतियों की हाट: मोतियों का बाजार (यहाँ अर्थ है मूल्यवान अनुभव)

चिनगारियों का मेला: आग की छोटी-छोटी कणिकाओं का समूह (यहाँ अर्थ है तीव्र भावनाएं)

हास: हँसी

मधु दूत: मीठा संदेशवाहक

रोष: क्रोध

भ्रू-भंगिमा: भौहों का टेढ़ा होना (क्रोध का भाव)

पतझार: वह ऋतु जिसमें पत्ते झड़ते हैं (यहाँ अर्थ है निराशा का समय)

सहे जो: जो सहन करे

उर: हृदय

अचंचल: स्थिर, विचलित न होने वाला

वेदना-जल: पीड़ा का जल (आँसू)

स्वप्न-शतदल: सपनों का सौ पंखुड़ियों वाला कमल (अनेक सपने)

एकाकी: अकेला

विरह: जुदाई, वियोग

दुकेला: दोहरा, दो गुना

पंक्तियों सहित भावार्थ:

पंथ रहने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला ! घेर ले छाया अमा बन, आज कज्जल अश्रुओं में रिमझिमा ले यह घिरा घन, और होंगे नयन सूखे, तिल बुझे औ' पलक रूखे, आर्द्र चितवन में यहाँ शत विद्युतों में दीप खेला !


भावार्थ: कवयित्री कहती हैं कि जीवन का रास्ता भले ही अनजान हो, और मेरी आत्मा अकेली रहे तो भी कोई बात नहीं। आज अमावस्या की रात के समान गहरा अंधकार मुझे घेर ले, और यह घिरा हुआ बादल काजल जैसे काले आँसुओं में धीरे-धीरे बरस ले। दूसरों की आँखें सूखी और पलकें नीरस होंगी, लेकिन मेरी नम आँखों की दृष्टि में सैकड़ों बिजलियों के बीच एक दीपक जलता रहेगा, अर्थात निराशा के बीच भी आशा की किरण बनी रहेगी।


अन्य होंगे चरण हारे और हैं जो लौटते, दे शूल को संकल्प सारे; दुखव्रती निर्माण उन्मद, यह अमरता नापते पद, बाँध देंगे अंक संमृति से तिमिर में स्वर्ण बेला ।


भावार्थ: और लोग होंगे जो थक कर हार मान लेंगे और अपने सारे संकल्पों को पीड़ाओं को सौंपकर लौट जाएंगे। लेकिन मैं तो दुख का व्रत लेने वाली, रचना के उत्साह में डूबी हुई हूँ। मेरे ये कदम अमरता की ओर बढ़ रहे हैं, और मैं अपनी यादों के आलिंगन से अंधकार में भी सुनहरी बेला (आशा का क्षण) बाँध दूंगी, अर्थात अपनी रचनाओं और अनुभवों से निराशा में भी आशा का संचार करूंगी।


दूसरी होगी कहानी, शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोयी निशानी;


भावार्थ: औरों की कहानी दूसरी होगी, जिनके शब्द खालीपन में मिट जाएंगे और जिनकी पहचान धूल में खो जाएगी।


आज जिस पर प्रलय विस्मित, मैं लगाती चल रही नित, मोतियों की हाट औ' चिनगारियों का एक मेला !


भावार्थ: आज जिस रास्ते पर प्रलय भी आश्चर्यचकित है, उस पर मैं हमेशा चलती जा रही हूँ। यह रास्ता कभी मोतियों के बाजार जैसा मूल्यवान अनुभवों से भरा होता है, तो कभी चिनगारियों के मेले जैसा तीव्र भावनाओं से भरा होता है।


हास का मधु दूत भेजो रोष भ्रू-भंगिमा पतझार को चाहे सहे जो; ले मिलेगा उर अचंचल, वेदना-जल, स्वप्न-शतदल, जान लो वह मिलन एकाकी विरह में है दुकेला पंथ रहने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !


भावार्थ: चाहे हँसी का मीठा संदेशवाहक आए या क्रोध की भौहों के टेढ़ेपन रूपी पतझड़ को सहना पड़े, मेरा हृदय अविचल मिलेगा। इसमें पीड़ा के आँसू और सैकड़ों सपनों के कमल हैं। जान लो कि वह मिलन एकाकी विरह में भी दोगुना है, अर्थात अकेलेपन में भी प्रेम और वेदना की गहराई अधिक होती है। इसलिए, जीवन का रास्ता भले ही अनजान हो, और मेरी आत्मा अकेली रहे तो भी कोई बात नहीं।

कविता का सरल शब्दों में सारांश:

महादेवी वर्मा इस कविता में जीवन के अकेलेपन और अनिश्चित राह पर चलने के अपने दृढ़ संकल्प को व्यक्त करती हैं। वे कहती हैं कि उन्हें अकेले चलने में कोई डर नहीं है, भले ही उनके रास्ते में घोर अंधकार और दुख आएँ। दूसरों की आँखें भले ही निराशा से सूख जाएं, लेकिन उनकी आँखों में हमेशा आशा की किरण बनी रहेगी।

वे उन लोगों से अलग हैं जो हार मानकर लौट जाते हैं। वे तो दुख को स्वीकार कर रचनात्मकता के उत्साह में आगे बढ़ती रहेंगी और अपनी यादों तथा अनुभवों से निराशा के क्षणों में भी आशा का संचार करेंगी। उनका रास्ता कभी मूल्यवान अनुभवों से भरा होता है तो कभी तीव्र भावनाओं से।

वे कहती हैं कि चाहे सुख आए या दुख, उनका हृदय हमेशा स्थिर रहेगा और उसमें पीड़ा और अनगिनत सपने समाए रहेंगे। उनके लिए अकेलेपन में भी प्रेम और वेदना की अनुभूति गहरी और दोगुनी होती है। इसलिए, वे अंत में फिर कहती हैं कि जीवन का रास्ता भले ही अनजान हो और उनकी आत्मा अकेली रहे, उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं है, वे अपने पथ पर चलती रहेंगी।

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