Sunday, April 6, 2025

सरयू भैया: सारांश (रामवृक्ष बेनीपुरी)

                        सरयू भैया: सारांश 

रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखित संस्मरणात्मक निबंध "सरयू भैया" एक ऐसे असाधारण ग्रामीण व्यक्ति का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है जो अपनी निस्वार्थ सेवा, परोपकारिता और दूसरों के प्रति गहरी सहानुभूति के कारण अपने आसपास के लोगों के लिए एक आदर्श और पूजनीय व्यक्ति बन जाता है। लेखक अपने पड़ोसी सरयू भैया के व्यक्तित्व और जीवन के विभिन्न पहलुओं को बड़े ही आत्मीय और संवेदनशील ढंग से उकेरते हैं।

लेख की शुरुआत सरयू भैया के नामकरण की विशिष्टता से होती है। लेखक बताते हैं कि गाँवों में कभी-कभी पुरुषों के नाम गंगा, यमुना या सरयू जैसे नदियों के नाम पर रख दिए जाते हैं, जबकि महिलाओं के नामों में ऐसा प्रायः नहीं होता। लेखक के घर से सटे हुए साधारण से घर के मालिक सरजू भैया हैं, जिनके साथ लेखक का एक विशेष आत्मीय संबंध है। लेखक उनसे बड़े भाई जैसा स्नेह रखते हैं, जबकि सरजू भैया उन्हें छोटे भाई की तरह मानते हैं।

सरजू भैया का शारीरिक वर्णन लेखक बड़े ही रोचक ढंग से करते हैं। वे गाँव के सबसे लंबे और दुबले व्यक्तियों में से एक हैं, जिनका रंग साँवला, टाँगें बगुले जैसी लंबी और बाहें चिंपांजी की तरह बड़ी हैं। धोती पहने और कंधे पर अंगोछा डाले खड़े सरजू भैया की पसलियों की हड्डियाँ आसानी से गिनी जा सकती हैं। उनकी नाक लंबी और खड़ी है, भवें घनी हैं, बड़ी-बड़ी आँखें कोटरों में धँसी हुई हैं, गाल चिपके हुए हैं और शरीर की नसें उभरी हुई दिखती हैं, मानो किसी ने पतली डोरियों से उनके शरीर को बाँध रखा हो।

ऊपर से देखने पर सरजू भैया किसी भुखमरे और मनहूस आदमी की तरह लग सकते हैं, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। लेखक उन्हें अपने गाँव के सबसे जिंदादिल लोगों में से एक बताते हैं। वे मिलनसार, मजाकिया और हँसमुख स्वभाव के हैं। जब वे दिल खोलकर हँसते हैं, तो उनके छोटे-छोटे दाँत बेतहाशा चमकते हैं और उनका पूरा शरीर हिलने-डुलने लगता है, मानो हर अंग हँस रहा हो। इतना ही नहीं, सरजू भैया के पास इतनी संपत्ति है कि वे न केवल अपना और अपने परिवार का पेट भर सकते हैं, बल्कि मेहमानों की भी अच्छी सेवा कर सकते हैं।

फिर सवाल उठता है कि उनकी यह हड्डियों का ढाँचा क्यों है? इसके जवाब में लेखक एक पुरानी कहावत पेश करते हैं - "काजी जी दुबले क्यों? शहर के अंदेश से।" लेखक स्पष्ट करते हैं कि सरजू भैया की यह हालत उनके अपने कारण नहीं, बल्कि दूसरों के उपकार के चलते हुई है। परोपकार की भावना ने उन्हें न केवल शारीरिक रूप से कमजोर कर दिया है, बल्कि उनकी संपत्ति को भी काफी नुकसान पहुँचाया है।

लेखक सरजू भैया के पिता, गुमाश्ता जी का जिक्र करते हैं, जो गाँव के अच्छे किसानों में से थे। उनका घर साफ-सुथरा और बैठकखाना अच्छा था। लेकिन उनके मरने के बाद सरजू भैया ने लेन-देन चौपट कर दिया, बाढ़ ने खेती बर्बाद कर दी और भूकंप ने घर का सत्यानाश कर दिया। लेखक का मानना है कि यदि सरजू भैया लेन-देन में न उलझे होते, तो शायद वे अपनी खेती और घर को बचा सकते थे।

लेखक "लेन-देन" को नग्न शब्दों में "सूदखोरी" कहते हैं और बताते हैं कि यह आदमी के आदमीपन को खो देता है। वे सूदखोरों की तुलना चीलर नामक कीड़े से करते हैं, जो गंदे कपड़ों में चुपचाप पड़ा रहता है और धीरे-धीरे खून चूसता है, जिसका अनुभव भी आसानी से नहीं होता। सरजू भैया ऐसे चीलर नहीं थे। उनका हृदय विशाल था और जो भी दुखी व्यक्ति उनके पास अपनी विपदा लेकर आता, वे उसे देवता की तरह मदद करते थे। जब वसूली का समय आता और लोग आँसू बहाते हुए गिड़गिड़ाते, तो उनका हृदय पिघल जाता। सूद तो दूर की बात, कुछ ही दिनों में मूलधन भी शून्य हो जाता।

बाढ़ और भूकंप ने बेशक उनके खेत और घर को बर्बाद किया, लेकिन लेखक का मानना है कि यदि सरजू भैया लेन-देन के बाद भी अपनी खेती और घर पर ध्यान देते, तो वे आज भी गरीबी से बचे रहते। वे आलसी या कामचोर नहीं थे, बल्कि चतुर, फुर्तीले और मेहनती व्यक्ति थे। लेकिन उन्हें दूसरों के कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती थी।

लेखक विभिन्न उदाहरणों से सरजू भैया की निस्वार्थ सेवा भावना को स्पष्ट करते हैं। गंगोभाई के घर में बच्चा बीमार होने पर वैद्य को बुलाने सरजू भैया जाते हैं। हिरदे को बाजार से सामान लाना हो तो वह सरजू भैया को भेजता है। राजकुमार के बीमार मामाजी की खोज-खबर लाने का जिम्मा सरजू भैया पर होता है। परमेसर को रजिस्ट्री करानी हो तो पहचान करने वाला सरजू भैया होता है। गाँव में किसी के घर में शादी-ब्याह या कोई धार्मिक अनुष्ठान हो, तो सरजू भैया अस्त-व्यस्त रहते हैं। किसी की मृत्यु होने पर, खासकर रात के अंधेरे में, कफन खरीदने की जिम्मेदारी सरजू भैया पर ही होती है। इस प्रकार, गाँव भर के लोगों का बोझ अपने सिर पर लेकर सरजू भैया ने न केवल अपनी संपत्ति गँवाई है, बल्कि इस उम्र में अपनी कमर भी झुका ली है। उनका घर दिन-रात, हर मौसम में जरूरतमंदों के लिए खुला रहता है। लेखक विक्टर ह्यूगो की कृति 'ला मिजरेब्ल' का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि डॉक्टर का दरवाजा और पादरी का फाटक हमेशा खुला रहना चाहिए, और सरजू भैया अकेले ही इन दोनों के गुणों को धारण करते हैं।

लेखक सरजू भैया के व्यक्तित्व को अनुकरणीय, अनुसरणीय और पूजनीय मानते हैं। जब भी वे उन्हें देखते हैं, उनका मस्तक स्वतः ही उनके चरणों में झुक जाता है। लेकिन लेखक को सबसे ज्यादा दुख तब होता है जब वे देखते हैं कि इस नर-रत्न की कद्र बहुत कम लोग करते हैं। कुछ लोग उन्हें सीधा-सादा समझकर ठगने की कोशिश करते हैं। इतना ही नहीं, उन्हें अक्सर झंझटों में डालने की कोशिशें होती हैं और यदि वे किसी मुसीबत में पड़ जाते हैं, तो लोग उनकी मदद करने के बजाय उनके तड़पने का तमाशा देखते हैं।

लेखक एक हालिया घटना का जिक्र करते हैं जब सरजू भैया उनके पास आकर खड़े हुए और उनकी आँखों में आँसू थे। पता चला कि उनके घर में एक छोटी-सी घटना हो गई थी, जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि सरजू भैया के पास धन और बल दोनों की कमी थी। लेखक ने उन्हें ढाँढस बंधाया, लेकिन रात भर लोगों की कृतघ्नता ने उन्हें सोने नहीं दिया।

लेखक एक और कहानी बताते हैं जब उन्हें कुछ रुपयों की जरूरत थी और सरजू भैया ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें पैसे दे दिए, जिसे लेखक आज तक चुका नहीं पाए हैं। इसी बीच, सरजू भैया को भी रुपयों की जरूरत हुई, लेकिन संकोचवश उन्होंने लेखक से नहीं माँगा। वे एक सूदखोर महाजन के पास गए, जिसने उनसे पहले कर्ज लिया था और अब अमीर बन चुका था। महाजन ने तुरंत उन्हें रुपए दे दिए, लेकिन बदले में कागज पर अंगूठे का निशान लगवा लिया। अब वह महाजन सरजू भैया से जल्द रुपए लौटाने के लिए कह रहा है, नहीं तो वह मुकदमा कर देगा। सरजू भैया अपनी बेचारगी व्यक्त कर रहे थे और लेखक उनकी नादानी पर हैरान थे।

सरजू भैया की पाँच बेटियाँ हुईं। उनकी पत्नी, जो कद में उनसे बिल्कुल विपरीत, बहुत छोटी थीं, लेकिन गुणों में उनकी तरह थीं, हाल ही में बेटे की इच्छा लिए मर गईं। लेखक को नहीं पता कि इस इच्छा ने सरजू भैया को कितना चिंतित किया है। वे अपनी बेटियों से बहुत प्यार करते हैं और लेखक के बेटों और भतीजों का बचपन उनके कंधों पर ही बीता है। लेकिन बेटियाँ तो ससुराल चली जाएँगी। क्या सरजू भैया का यह पुश्तैनी घर खंडहर बन जाएगा? क्या उनकी कोई निशानी उनके पड़ोस को गुलजार नहीं रख पाएगी? यह सोचकर लेखक के परिवार में उदासी छा जाती है। उनकी पत्नी की मृत्यु के बाद लेखक की मौसी ने कहा कि सरजू भैया की उम्र ही कितनी है और उन्हें दोबारा शादी कर लेनी चाहिए ताकि उनका वंश आगे बढ़ सके। लेखक की पत्नी रानी ने भी सरजू भैया से शादी करने का आग्रह किया, जिस पर सरजू भैया ने हँसते हुए कहा कि क्या वे इसलिए शादी करें ताकि लेखक को नई भाभी से मजाक करने का मौका मिले।

अंततः, "सरयू भैया" एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो अपनी सादगी, निस्वार्थता और दूसरों के प्रति करुणा के भाव के कारण साधारण होते हुए भी असाधारण बन जाता है। लेखक न केवल उनके गुणों का बखान करते हैं, बल्कि समाज की कृतघ्नता और संवेदनहीनता पर भी गहरा दुख व्यक्त करते हैं। यह निबंध मानवीय मूल्यों, त्याग और परोपकार की भावना का एक मार्मिक और प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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