Sunday, April 6, 2025

2. मानव ( सुमित्रानंदन पंत)

 

                       2. मानव

                                 सुमित्रानंदन पंत


सुंदर है विहग, सुमन सुंदर, (पक्षी सुंदर हैं, फूल सुंदर हैं,) 

मानव ! तुम सबसे सुंदरतम, (हे मानव! तुम सबसे अधिक सुंदर हो,)

निर्मित सबकी तिल-सुषमा से (तुम सबका थोड़ा-थोड़ा सौंदर्य लेकर बनाए गए हो,) 

तुम निखिल सृष्टि में चिर निरुपम ! (तुम इस संपूर्ण सृष्टि में हमेशा अद्वितीय हो!)


भावार्थ: कवि कहते हैं कि प्रकृति में पक्षी और फूल अपनी सुंदरता से मन मोह लेते हैं, लेकिन हे मनुष्य! तुम तो इन सबसे भी बढ़कर सुंदर हो। ऐसा लगता है कि विधाता ने सबकी थोड़ी-थोड़ी सुंदरता लेकर तुम्हें बनाया है, इसलिए इस पूरी सृष्टि में तुम हमेशा अनुपम और बेजोड़ रहोगे।


यौवन ज्वाला से वेष्टित तन, (तुम्हारा शरीर यौवन की अग्नि से घिरा हुआ है,) 

मृदु त्वच, सौंदर्य प्ररोह अंग, (तुम्हारी त्वचा कोमल है और तुम्हारे अंग सौंदर्य को अंकुरित करने वाले हैं,) 

न्योछावर जिन पर निखिल प्रकृति, (जिन पर संपूर्ण प्रकृति अपना सौंदर्य न्योछावर करती है,) 

छाया प्रकाश के रूप रंग ! (जो छाया और प्रकाश के विभिन्न रंगों से भरे हैं!)


भावार्थ: तुम्हारा शरीर युवावस्था की ऊर्जा और तेज से परिपूर्ण है। तुम्हारी कोमल त्वचा और सुंदर अंग ऐसे लगते हैं मानो वे सौंदर्य को जन्म दे रहे हों। पूरी प्रकृति अपने विभिन्न रूप और रंगों के साथ तुम्हारे सौंदर्य पर मोहित है और उसे अर्पित करती है।


धावित कृश नील शिराओं में (तुम्हारी पतली नीली नसों में) 

मदिरा से मादक रुधिर धार, (मदिरा के समान मादक रक्त की धारा बहती है,) 

आँखें हैं दो लावण्य-लोक, (तुम्हारी दो आँखें सौंदर्य के दो लोक हैं,) 

स्वर में निसर्ग-संगीत-सार ! (और तुम्हारे स्वर में प्रकृति के संगीत का सार समाहित है!)


भावार्थ: तुम्हारी पतली नीली नसों में मदहोश करने वाला रक्त प्रवाहित होता है। तुम्हारी आँखें ऐसी लगती हैं मानो वे सौंदर्य के दो अलग-अलग संसार हों, और जब तुम बोलते हो तो ऐसा लगता है जैसे प्रकृति का सारा मधुर संगीत तुम्हारे स्वर में उतर आया हो।


पृथु उर, उरोज, ज्यों सर, सरोज, (तुम्हारा चौड़ा हृदय और वक्षस्थल तालाब और कमल के समान हैं,) 

दृढ़ बाहु, प्रलंब प्रेम-बंधन, (तुम्हारी भुजाएँ मजबूत हैं, जो प्रेम के लंबे बंधन बनाती हैं,) 

पीनोरु स्कंध जीवन तरु के, (तुम्हारी पुष्ट जंघाएँ और कंधे जीवन रूपी वृक्ष के तने के समान हैं,) 

कर, पद, अंगुलि, नख-शिख शोभन ! (तुम्हारे हाथ, पैर, उंगलियाँ और नाखून तक सुंदर हैं!)


भावार्थ: तुम्हारा विशाल हृदय और उन्नत वक्षस्थल किसी तालाब में खिले हुए कमल के समान सुंदर और पवित्र हैं। तुम्हारी मजबूत भुजाएँ प्रेम के अटूट बंधन बनाने में सक्षम हैं। तुम्हारी भरी हुई जंघाएँ और मजबूत कंधे जीवन के वृक्ष के मजबूत तने जैसे हैं, और तुम्हारे हाथ, पैर, उंगलियाँ यहाँ तक कि नाखूनों की शोभा भी निराली है।


यौवन की मांसल, स्वस्थ गंध, (यौवन की मांसल और स्वस्थ सुगंध,) 

नव युग्मों का जीवनोत्सर्ग ! (नए जोड़ों का जीवन को समर्पित करना!) 

आल्हाद अखिल, सौंदर्य अखिल, (संपूर्ण आनंद, संपूर्ण सौंदर्य,) 

आः प्रथम प्रेम का मधुर स्वर्ग ! (आह! पहले प्रेम का मधुर स्वर्ग!)


भावार्थ: तुम्हारे यौवन में एक स्वस्थ और आकर्षक गंध है। नए जोड़े एक-दूसरे के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। इस संसार में जो भी आनंद और सौंदर्य है, वह सब प्रथम प्रेम के मधुर स्वर्ग के समान अनुभव होता है।


आशाऽभिलाष, उच्चाकांक्षा, (आशाएँ, इच्छाएँ, उच्च आकांक्षाएँ,) 

उद्यम अजस्र, विघ्नों पर जय, (निरंतर प्रयास, बाधाओं पर विजय,) 

विश्वास, असद् सद् का विवेक (विश्वास और अच्छे-बुरे का ज्ञान,) 

दृढ़ श्रद्धा, सत्य प्रेम अक्षय ! (दृढ़ निष्ठा और कभी न खत्म होने वाला सच्चा प्रेम!)


भावार्थ: तुम्हारे भीतर आशाएँ, इच्छाएँ और बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएँ हैं। तुम लगातार प्रयास करते हो और हर मुश्किल पर विजय प्राप्त करते हो। तुम्हें अपने आप पर विश्वास है और तुम अच्छे और बुरे के बीच अंतर समझते हो। तुम्हारे हृदय में अटूट श्रद्धा और कभी न मिटने वाला सच्चा प्रेम है।


मानसी भूतियाँ ये अमंद (ये मानसिक शक्तियाँ जो कभी कम नहीं होतीं,) 

सहृदयता, त्याग, सहानुभूति, (दूसरों के प्रति दया, त्याग की भावना, सहानुभूति,) 

-जो स्तंभ सभ्यता के पार्थिव, (-जो इस पृथ्वी पर सभ्यता के आधार स्तंभ हैं,) 

संस्कृति स्वर्गीय, स्वभाव पूर्ति ! (जो स्वर्गीय संस्कृति हैं और मानव स्वभाव की पूर्णता हैं!)


भावार्थ: तुम्हारे भीतर ऐसी मानसिक शक्तियाँ हैं जो कभी क्षीण नहीं होतीं, जैसे दूसरों के प्रति दया, त्याग की भावना और सहानुभूति। यही गुण इस भौतिक संसार में सभ्यता के मजबूत स्तंभ हैं और यही गुण स्वर्गीय संस्कृति और मानव स्वभाव को पूर्णता प्रदान करते हैं।


मानव का मानव पर प्रत्यय, (एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य पर विश्वास,) 

परिचय, मानवता का विकास, (आपसी पहचान और मानवता का विकास,) 

विज्ञान ज्ञान का अन्वेषण, (विज्ञान के ज्ञान की खोज,) 

सब एक, एक सब में प्रकाश । (सब एक हैं, और एक में सबका प्रकाश है।)


भावार्थ: एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य पर भरोसा करना, आपस में पहचान बढ़ाना और मानवता का विकास करना महत्वपूर्ण है। विज्ञान के माध्यम से ज्ञान की खोज करना भी मनुष्य की विशेषता है। अंततः, सभी मनुष्य एक ही हैं और हर एक में उस परम शक्ति का प्रकाश विद्यमान है।


प्रभु का अनन्त वरदान तुम्हें, (प्रभु का अनंत आशीर्वाद तुम्हारे साथ है,) 

उपभोग करो प्रतिक्षण नव-नव, (हर पल नए-नए अनुभवों का आनंद लो,) 

क्या कमी तुम्हें है त्रिभुवन में (तीनों लोकों में तुम्हें किस चीज की कमी है) 

यदि बने रह सको तुम मानव ? (यदि तुम सच्चे मनुष्य बने रहो?)


भावार्थ: ईश्वर का असीम आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है। इसलिए हर पल नए-नए अनुभवों का आनंद लो। इस पूरे ब्रह्मांड में तुम्हें किसी भी चीज की कमी नहीं होगी, यदि तुम अपने मानवीय गुणों को बनाए रखो और सच्चे अर्थों में मनुष्य बने रहो।

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