Saturday, April 5, 2025

प्रश्न - बढ़े चलो कविता का सारांश लिखिए।।

                        3. बढ़े चलो


                                    कवि - पद्मकान्त मालवीय


चले चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो, चले चलो । 

प्रचंड सूर्य-ताप से, न तुम जलो, न तुम गलो ।।


हृदय से तुम निकाल दो अगर हो पस्त हिम्मती ।

नहीं है खेल मात्र ये, ये जिंदगी है जिंदगी । 

न रक्त है, न स्वेद है, न हर्ष है, न खेद है,

ये जिंदगी अभेद है, यही तो एक भेद है ।

समझ के सब चले चलो, कदम कदम बढ़े चलो ।।


पहाड़ से चली नदी, रुकी नहीं कहीं जरा ।

गई जिधर उधर किया जमीन को हरा भरा ।

चली समान रूप से, जमीन का न ख्याल कर, 

मगन रही निनाद में, जमीन पर, पहाड़ पर । 

उसी तरह चले चलो, उसी तरह बढ़े चलो ।।


जलाओ दिल के दाग से बुझे दिलों के दीप को । 

जो दूर हैं उन्हें भी खींच लो जरा समीप को ।

सहो जमीन की तरह, डरो न आसमान से,

जलो तो आन बान से, बुझो तो एक शान से । अखंड-दीप से जलो, सदा-बहार से खिलो ।।


बिना पिए रहे नशा, न चढ़के वो उतर सके । 

जुनून वह सवार हो कि जान उम्र भर सके । 

वो काम तुम करो यहां, जो दूसरा न कर सके ।

कोई तुम्हारी शान से, न जी सके, न मर सके ।

समीर से चले चलो, समीर से बहे चलो ।।



प्रश्न - "बढ़े चलो " कविता का सारांश लिखिए।

उत्तर - यह कविता "बढ़े चलो" पद्मकान्त मालवीय द्वारा लिखी गई एक प्रेरणादायक कविता है जो जीवन में निरंतर आगे बढ़ने का संदेश देती है।

कवि कहते हैं कि हमें हमेशा चलते रहना चाहिए, आगे बढ़ते रहना चाहिए। हमें प्रचंड सूर्य की गर्मी से न तो जलना चाहिए और न ही पिघलना चाहिए, अर्थात मुश्किलों और चुनौतियों से घबराना नहीं चाहिए।

                            यदि हमारे हृदय में कमजोरी या निराशा हो, तो उसे निकाल देना चाहिए क्योंकि यह जीवन कोई खेल नहीं है, बल्कि एक वास्तविक और महत्वपूर्ण यात्रा है।   यह जीवन अभेद्य है, इसमें रक्त, पसीना, हर्ष या खेद जैसी सामान्य भावनाएं ही सब कुछ नहीं हैं, बल्कि इससे बढ़कर कुछ रहस्यमय और गहरा है। इसलिए, हमें सब कुछ समझकर अपने कदम आगे बढ़ाते रहना चाहिए।

                          कवि नदी का उदाहरण देते हैं जो पहाड़ से निकलकर लगातार बहती रहती है और कहीं भी थोड़ी देर के लिए भी नहीं रुकती। वह जिधर भी जाती है, धरती को हरा-भरा कर देती है। वह समान रूप से बहती है, जमीन का कोई भेद नहीं करती और अपनी मधुर ध्वनि में मगन रहती है, चाहे जमीन हो या पहाड़। उसी प्रकार, हमें भी बिना रुके, बिना भेदभाव के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए।

                                   हमें अपने दिल के उत्साह से उन निराश लोगों के दिलों के बुझे हुए दीपों को जलाना चाहिए। जो हमसे दूर हैं, उन्हें भी प्यार और अपनत्व से अपने करीब लाना चाहिए। हमें धरती की तरह सहिष्णु बनना चाहिए और आसमान की ऊंचाइयों से डरना नहीं चाहिए। यदि हमें जलना है तो शान से जलना चाहिए और यदि बुझना भी पड़े तो एक गरिमा के साथ बुझना चाहिए। हमें एक अखंड दीपक की तरह जलते रहना चाहिए और सदाबहार फूल की तरह खिलते रहना चाहिये।

                              हमें बिना शराब पिए ही ऐसा नशा होना चाहिए जो कभी न उतरे, अर्थात अपने लक्ष्य के प्रति ऐसा अटूट जुनून होना चाहिए जो जीवन भर बना रहे। हमें ऐसे काम करने चाहिए जो कोई और न कर सके, जिससे हमारी शान ऐसी हो कि कोई वैसा न जी सके और न मर सके। हमें हवा की तरह चलते रहना चाहिए और हवा की तरह बहते रहना चाहिए, अर्थात स्वतंत्रता और गतिशीलता के साथ अपने मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

                          संक्षेप में, यह कविता हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करते हुए, निरंतर प्रगति करने, दूसरों को प्रेरित करने और एक सार्थक जीवन जीने का संदेश देती है।

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