"सूरज बनो"
अँधियारा चाहे कितना घना,
दीपक फिर भी जलता है।
जो गिरकर भी उठ जाए बार-बार,
वही सफलता तक चलता है।
मत रुकना तू हार के डर से,
संघर्षों में ही गौरव है।
जो खुद को हर दिन गढ़ता है,
वही तो असली योद्धा है।
तू खुद ही अपनी शक्ति बन,
कदमों तले पर्वत रख दे।
सूरज बन हर दिन उगता जा,
छाँव नहीं, उजियारा कर दे।
२. – "जय भारत"
जब रण में शंख बजा करते,
वीरों के स्वर गूँजा करते।
धरती माँ के लाल खड़े हों,
तो दुश्मन काँप उठा करते।
तलवारों की धारों में थी,
सिंहों जैसी दहाड़ हमारी।
हम वो ज्वाला, हम वो शक्ति,
जिससे काँपे दुनिया सारी।
रक्त भले ही तन से बह जाए,
मिट्टी को तिलक चढ़ाते हैं।
जय भारत कह प्राण गँवाकर,
अमर वीर कहलाते हैं।
३. – "शहीद की माँ"
भोर हुई तो मंदिर में,
दीप जलाने आई थी।
हाथों में आरती की थाली,
आँखों में परछाई थी।
ख़बर मिली – “तेरा लाल गया,
सरहद पर वीरगति पाई है।”
माँ ने चुपचाप दीप जलाया,
बोली – “अब जग उजियाई है।”
उस दिन माँ ने रोया नहीं,
बस आँचल से धरती ढक दी।
कहा – “मेरा बेटा सोया नहीं,
माँ भारती की गोद में रख दी।”
४. – "तेरी मुस्कान"
तेरी मुस्कान जब दिख जाती,
मन में मधुर तरंगें उठतीं।
जैसे सावन की पहली बूँदें,
सूखी धरती को छू लेतीं।
तेरी आँखें बोलें चुपके,
जैसे नदिया झरनों से बात करे।
तेरी चाल में झूमे गगन,
तेरी हँसी में फाग सजे।
अगर तू रूठे, तो दिन सूना,
अगर तू हँसे, तो चाँद खिले।
तेरी मुस्कान ही जीवन का गीत,
जिससे सारे सपने मिले।
५. – "वसंत आया"
फूलों ने खोलीं पंखुड़ियाँ,
मधुमक्खी गुनगुन गाने लगी।
पवन बही तो डाली बोली,
“लो, फिर ऋतु मुस्काने लगी।”
कोयल कुहके आम्र मंजर में,
धरती ने पहनी हरित चूनर।
सूरज ने भी नभ में लिखा—
“जीवन है सुंदर, अमर, निरंतर।”
हर कली का मन जैसे बोले,
“छू लो जीवन की लय नई।”
वसंत आया, गीत सुनाओ,
सजाओ यह धरा हरी भई।
६. – "माँ तू अमर है"
जब भी गिरा मैं जीवन पथ पर,
तेरे शब्दों ने थामा है।
तेरा आँचल जैसे छाँव भरा,
जिसमें हर दुख सोया है।
तेरे बिना न मैं कुछ हूँ,
तू ही मेरा आधार है।
तेरे चरणों में जो शांति मिले,
वो स्वर्ग से भी पार है।
तू मंदिर की आरती जैसी,
तू ही मेरा संस्कार है।
साँसों में बस नाम तेरा,
माँ, तू सदा अमर है।
७.– "अंतर दीप"
मन मंदिर में दीप जले जब,
अंधियारा खुद भाग चला।
जो खोजे खुद में सच्चा प्रकाश,
वो सत्य का राग बना चला।
न बाहर सुख, न जग में चैन,
जो भीतर झाँके, पाता है।
शब्दों में नहीं, मौन में वह,
ईश्वर को पहचानता है।
जो "मैं" का परदा हटाएगा,
वो जग सारा देख सकेगा।
जिसने खुद को पाया भीतर,
वो ही परमेश्वर लेख सकेगा।
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