प्रश्न - कारीगरों ने सेठ को उसके कंजूसपन का मजा किस प्रकार चखाया ?
उत्तर - एक सेठ था। उसके बारे में आम धारणा थी कि वह बहुत ही कंजूस है। एक पैसा भी उससे प्राप्त करना कठिन होता था। वह एक भवन का निर्माण करवा रहा था। भवन बनानेवाले कारीगर भी उसकी कंजूसी से खार खाए हुए थे। अतः उन्होंने उसे उसके कंजूसपने का मजा चखाने की बात सोची। कारीगरों के कहा - "सेठजी, यदि भवन को मजबूत और सैकड़ों वर्षों तक चलनेवाली नामी इमारत के रूप में बनवाना हो तो इसकी नींव में घी डालना पड़ेगा। थोड़ा नहीं, जब तक नींव जमीन की सतह तक नहीं आ जाती तब तक तर करना पड़ेगा।" सेठजी ने जरा सोचा और कहा "जितना घी लगे, उतना बुलवा लेते हैं।" घी बुलवाया गया और नींव में घड़े-के-घड़े उँड़ेले जाने लगे। सेठ तो कारीगरों की बातों पर विश्वास कर अपने काम में लग गया, लेकिन कारीगरों को बोध हुआ कि हम गलत कर रहे हैं। उन्होंने घी डालना बंद किया और सेठजी के पास जिज्ञासा एवं क्षमा से भरकर पहुँचे और पूछा- "हे सेठजी, एक तरफ तो आप अपने बेटे तक को भी पैसा बड़ी मुश्किल से देते हैं, दूसरी ओर आप मकान की नींव में कई घड़े घी डालने के लिए सहज ही तैयार हो गए। यह कुछ समझ में नहीं आया।" सेठ ने कहा कि बेटे की उम्र अभी छोटी है। वह उस पैसे का उपयोग अनुत्पादक कार्यों में करेगा और आप लोगों की राय अनुसार भवन की नींव के लिए घी अनिवार्य है। जहाँ जरूरी है वहाँ धन अवश्य खर्च करना चाहिए। अतः बात कंजूसी की नहीं है, धन के सदुपयोग की है। बाजार के नियंत्रण की है। सेठ की बात सुनकर कारीगरों सहित कई लोगों के दिमागों के द्वार खुल गए।
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