देश धर्म तथा सेवक
(26)
"अपनी खुशी की बात को, कहता हि फिरता आदमी ।
पर, देश की क्या बात है, दिखती नहीं उसको कमी ॥
जब दूसरों के दुःख में और सुख में सहभागि हो ।
तब जिंदगी में कीर्ति उसकी, आप फैलेगी कहो ।।"
भावार्थ:
अधिकतर लोग सिर्फ अपनी खुशी और उपलब्धियों की बातें करते रहते हैं, लेकिन देश की समस्याओं और जरूरतों पर ध्यान नहीं देते।
जो व्यक्ति दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनता है और उनकी सहायता करता है, वही सच्चे सम्मान और यश का हकदार होता है।
(27)
"ऐ भारतीयों ! आँख अपनी, खोलकर देखो जरा ।
चारों तरफ से शत्रुगण अब, द्वार पर आके भरा ॥
तुम आपसी मतभेद को, इस वक्त बढवाओ नहीं।
सब एक हो, सावध रहो, इस देश को जागो सही ॥"
भावार्थ:
संत तुकडोजी महाराज भारतीयों को सचेत करते हुए कहते हैं कि देश चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ है।
इस संकट की घड़ी में हमें आपसी झगड़े छोड़कर एकता बनाए रखनी चाहिए और अपने देश की रक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए।
(28)
"सबके धरम भी धर्म है, गर कर्म सच्चे हो गये ।
किसिके, धरम में शक्ति नहिं, जब शर्म जैसे कर गये ॥
अरे धर्म तो कर्त्तव्य है, सब विश्व को धारण करे ।
जिसकी कुवत जैसी रही, यह कर दिखाये हर तरह ।।"
भावार्थ:
सच्चा धर्म केवल पूजा-पाठ या परंपराओं का पालन नहीं, बल्कि सच्चे और नेक कर्म करने में है।
यदि किसी धर्म के अनुयायी अपने कर्तव्य को भूलकर अधर्म का आचरण करते हैं, तो वह धर्म शक्तिहीन हो जाता है।
हर व्यक्ति को अपने सामर्थ्य के अनुसार धर्म और कर्तव्य का पालन करना चाहिए, जिससे संपूर्ण विश्व का कल्याण हो।
(29)
"अजि क्या सभाएँ ही करोगे, या कभी कर जाओगे ?
करने लगो तब ही अनोखी राह भी तुम पाओगे ॥
जब तक न मुख में गुड मिला, कहने हि से क्या रस मिले ।
वैसे ही अनुभव-प्राप्ति को, साधन हि करना है भले !!"
भावार्थ:
केवल भाषण देने या सभाएँ करने से कोई बदलाव नहीं आएगा। जब तक हम स्वयं कार्य नहीं करेंगे, तब तक सफलता नहीं मिलेगी।
जैसे केवल गुड़ का नाम लेने से मिठास महसूस नहीं होती, वैसे ही जब तक हम कर्म और अनुभव से नहीं सीखते, तब तक सच्ची सफलता प्राप्त नहीं हो सकती।
(30)
"धीरज बडा ही मित्र है, हर आदमी को तारता ।
सत्संग ऊपर हो अगर, तो जनम ही उद्धारता ।।
जो आततायी से करे, व्यवहार दुख वह पायगा ।
जो शांतिसेवक बन सके, वह कभी न धोखा खायेगा ॥"
भावार्थ:
धैर्य मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र होता है, जो उसे हर परिस्थिति में सही मार्ग दिखाता है।
यदि व्यक्ति अच्छे लोगों की संगति में रहता है, तो उसका जीवन भी सफल बन जाता है।
जो अत्याचारी लोगों से गलत व्यवहार करता है, वह स्वयं दुख भोगता है, जबकि जो शांति और सेवा के मार्ग पर चलता है, वह कभी धोखा नहीं खाता।
निष्कर्ष:
संत तुकडोजी महाराज की ये कविताएँ हमें सिखाती हैं कि हमें केवल अपनी खुशियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि देश और समाज के कल्याण के बारे में भी सोचना चाहिए।
सच्चा धर्म अच्छे कर्मों में है, केवल चर्चाएँ करने से कुछ नहीं होगा, बल्कि हमें कर्मशील बनना होगा। धैर्य और सत्संग का महत्व समझकर हमें अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना चाहिए।
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