Sunday, February 16, 2025

भावार्थ - राष्ट्रजागृति की आवश्यकता

                   राष्ट्रजागृति की आवश्यकता 


६६


"घर-वास्तु को लेकर चलो, या शादि में भी ले चलो।

किसकी जयंती-पुण्यतिथि हो, सम्मिलन या शिबिर लो।

दसवाँ किसीका, बारसा भी हो, तभी आग्रह करो।

हम सब जगह आकर कहे, बस राष्ट्र को उन्नत करो।।"


भावार्थ:

संत तुकडोजी महाराज यहाँ यह संदेश दे रहे हैं कि कोई भी सामाजिक या धार्मिक अवसर हो – गृह प्रवेश, विवाह, जयंती, पुण्यतिथि, सभा, शिविर या अन्य कोई आयोजन – इन सभी अवसरों का उपयोग राष्ट्रजागृति के लिए करना चाहिए। या फिर किसी का दसवां हो या फिर किसी का जन्म दिवस हो । जहां पर ज्यादा से ज्यादा लोग रहते हैं वहां पर हमें देश को जागृत करने की बातें करना चाहिए। हमें संदेश देना चाहिए की हमें राष्ट्र जागृति की गुहार लगाना है । हमारा यही उद्देश्य होना चाहिए । हमें हर स्थान पर जाकर यह संदेश देना चाहिए कि राष्ट्र की उन्नति सबसे महत्वपूर्ण है।


६७


"मैं राजकारण, पक्ष-पार्टी, मानता नहीं हूँ जरा।

मैं सत्य का ही हूँ पुजारी, सत्य ही प्रभू है मेरा।।

सब विश्वमानव एक करने का, मुझे गुरूमंत्र है।

इन्सान बनकर प्रेम करना ही, हमारा तंत्र है।।"


भावार्थ:

संत तुकडोजी महाराज यह कहते हैं कि वे राजनीति या किसी भी दलगत पक्षपात में विश्वास नहीं रखते। वे केवल सत्य के पुजारी हैं और सत्य को ही परमात्मा मानते हैं। उनका मुख्य संदेश है कि संपूर्ण विश्व के मानव एकता के सूत्र में बंध जाएं। मानवता का मार्ग अपनाकर प्रेमपूर्वक जीना ही सच्चा शासनतंत्र होना चाहिए।


६८


"इन हिंदुओं की बुद्धी-शक्ती, जागृती में लाइए।

औ आपस में झगडे मोल लेकर, क्षीण नहि बनवाइए।।

सब कुछ गयी, थोडी रही, उसको सम्हल रखके चलें।

तोभी भला होगा धरम का, बात को सब समझलें।।"


भावार्थ:

इस पंक्ति में हिंदुओं की बुद्धि और शक्ति को जाग्रत करने का आह्वान किया गया है। आपसी झगड़ों में फँसकर अपनी शक्ति को नष्ट नहीं करना चाहिए। यदि बहुत कुछ नष्ट हो गया हो और थोड़ी-सी शक्ति शेष हो, तो उसे संभालकर आगे बढ़ना चाहिए। तभी धर्म की रक्षा संभव होगी। सभी को इस बात को भली-भांति समझना चाहिए।


६९


"इन सब विदेशीयों को अपनी काबु में लाना चहो।

अध्यात्म का बल भारतीयों को बढाने को कहो।।

चारित्र्य-नीती-धर्म ही, इनको बँधावे बंध से।

पर भारती चंचल हुवा, लगता न सच्चे छंद से।।"


भावार्थ:

विदेशी शक्तियों को नियंत्रित करने की आवश्यकता है और भारतीयों को अपनी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। चरित्र, नीति और धर्म ही ऐसे तत्व हैं जो समाज को अनुशासन में रख सकते हैं। लेकिन आज भारतवासी चंचल हो गए हैं और सच्चे सिद्धांतों से दूर होते जा रहे हैं।


७०


"गंगा' हि मुख से बोलता, पर स्नान तो करता नहिं।

व्याख्यान देता 'सत्य' का, पर कुछ भी आचरता नहीं।।

कहने से 'लड्डू' क्या बनेगा ? मुखमें जब गिरता नहीं।

लढता नहीं जो शत्रु से, वह 'वीर' क्यों बोले कोई ? ।।"


भावार्थ:

संत तुकडोजी महाराज यहाँ व्यंग्यात्मक रूप से कहते हैं कि केवल ‘गंगा’ का नाम लेने से कोई पवित्र नहीं हो जाता, जब तक उसमें स्नान न किया जाए। इसी प्रकार, जो व्यक्ति सत्य की व्याख्या करता है लेकिन उसका पालन नहीं करता, उसकी बातें व्यर्थ होती हैं। केवल कहने से लड्डू नहीं बनते, जब तक उन्हें खाया न जाए। इसी तरह, जो शत्रु से नहीं लड़ता, उसे वीर नहीं कहा जा सकता। इसलिए, केवल बातें करने से कुछ नहीं होगा, बल्कि कर्म करना आवश्यक है।


बारसा का अर्थ - नामकरणविधी


सारांश:

संत तुकडोजी महाराज इन पंक्तियों में राष्ट्रजागृति का संदेश देते हैं। वे कहते हैं कि हर अवसर पर राष्ट्र की उन्नति का विचार करना चाहिए। सत्य, प्रेम और मानवता के मार्ग को अपनाना आवश्यक है। आपसी झगड़ों में शक्ति नष्ट करने के बजाय अपनी बुद्धि और बल को जाग्रत करना चाहिए। भारतीयों को अपने धर्म, नीति और चरित्र से जुड़े रहना चाहिए, अन्यथा वे विदेशी शक्तियों के प्रभाव में आ सकते हैं। केवल बातें करने से कुछ नहीं होता, बल्कि उन्हें आचरण में लाना चाहिए। जो शत्रु से नहीं लड़ता, वह वीर कहलाने योग्य नहीं होता।







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